Correct Answer:
Option A - सांख्यानुसारं विपर्ययस्य ‘पञ्च’ भेदा भवन्ति।
अर्थात् सांख्य-अनुसार विपर्यय (अविद्या) के - (1) अविद्या (2) अस्मिता (3) राग (4) द्वेष (5) अभिनिवेश ये पाँच भेद हैं। इन्हीं की क्रमानुसार- तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र संज्ञाएँ भी होती हैं। अत: अष्टाविंशति: (28) अशक्ति, नव (9) तुष्टि तथा अष्टौ (8) सिद्धि के भेद से प्रत्यय सर्ग के कुल पचास (50) भेद होते हैं।
A. सांख्यानुसारं विपर्ययस्य ‘पञ्च’ भेदा भवन्ति।
अर्थात् सांख्य-अनुसार विपर्यय (अविद्या) के - (1) अविद्या (2) अस्मिता (3) राग (4) द्वेष (5) अभिनिवेश ये पाँच भेद हैं। इन्हीं की क्रमानुसार- तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र संज्ञाएँ भी होती हैं। अत: अष्टाविंशति: (28) अशक्ति, नव (9) तुष्टि तथा अष्टौ (8) सिद्धि के भेद से प्रत्यय सर्ग के कुल पचास (50) भेद होते हैं।