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Q: रामायणे शबरीवृत्तान्त: क:?
  • A. पताका
  • B. पताकास्थानकम्
  • C. प्रकरी
  • D. प्रवेशक:
Correct Answer: Option C - रामायणे शबरीवृत्तान्त: ‘प्रकरी’ आसीत्। अर्थात् रामायण में शबरीवृत्तान्त ‘प्रकरी:’ के अन्तर्गत आता है। यह कथा वस्तु के दो भेदों (1) आधिकारिक तथा प्रासङ्गिक में प्रासङ्गिक के पताका और प्रकरी दो भेदों में से है, पताका आधिकारिक कथावस्तु के साथ लम्बे समय तक रहती है जैसे- ‘रामायण में सुग्रीव की कथा’ तथा प्रकरी थोड़े समय के लिए होती है जैसे- ‘जटायु की कथा’ ‘शबरी वृत्तान्त:’ आदि। अत: विकल्प (c) सही है शेष अन्य विकल्पों में (d) प्रवेशक यह अर्थोपक्षेपक (विष्कम्भक, प्रवेशक, चूलिका, अज्रस्य तथा अज्रवतार) का एक भेद है, तथा (b) जो अन्योक्ति के द्वारा प्रस्तुत भावी कथानक का सूचक होता है उसे पताकास्थानक कहते हैं। लक्षण- सानुबन्धं पताकाख्यं प्रकरी च प्रदेशभाक्।।
C. रामायणे शबरीवृत्तान्त: ‘प्रकरी’ आसीत्। अर्थात् रामायण में शबरीवृत्तान्त ‘प्रकरी:’ के अन्तर्गत आता है। यह कथा वस्तु के दो भेदों (1) आधिकारिक तथा प्रासङ्गिक में प्रासङ्गिक के पताका और प्रकरी दो भेदों में से है, पताका आधिकारिक कथावस्तु के साथ लम्बे समय तक रहती है जैसे- ‘रामायण में सुग्रीव की कथा’ तथा प्रकरी थोड़े समय के लिए होती है जैसे- ‘जटायु की कथा’ ‘शबरी वृत्तान्त:’ आदि। अत: विकल्प (c) सही है शेष अन्य विकल्पों में (d) प्रवेशक यह अर्थोपक्षेपक (विष्कम्भक, प्रवेशक, चूलिका, अज्रस्य तथा अज्रवतार) का एक भेद है, तथा (b) जो अन्योक्ति के द्वारा प्रस्तुत भावी कथानक का सूचक होता है उसे पताकास्थानक कहते हैं। लक्षण- सानुबन्धं पताकाख्यं प्रकरी च प्रदेशभाक्।।

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रामायणे शबरीवृत्तान्त: ‘प्रकरी’ आसीत्। अर्थात् रामायण में शबरीवृत्तान्त ‘प्रकरी:’ के अन्तर्गत आता है। यह कथा वस्तु के दो भेदों (1) आधिकारिक तथा प्रासङ्गिक में प्रासङ्गिक के पताका और प्रकरी दो भेदों में से है, पताका आधिकारिक कथावस्तु के साथ लम्बे समय तक रहती है जैसे- ‘रामायण में सुग्रीव की कथा’ तथा प्रकरी थोड़े समय के लिए होती है जैसे- ‘जटायु की कथा’ ‘शबरी वृत्तान्त:’ आदि। अत: विकल्प (c) सही है शेष अन्य विकल्पों में (d) प्रवेशक यह अर्थोपक्षेपक (विष्कम्भक, प्रवेशक, चूलिका, अज्रस्य तथा अज्रवतार) का एक भेद है, तथा (b) जो अन्योक्ति के द्वारा प्रस्तुत भावी कथानक का सूचक होता है उसे पताकास्थानक कहते हैं। लक्षण- सानुबन्धं पताकाख्यं प्रकरी च प्रदेशभाक्।।