Correct Answer:
Option B - रचना की दृष्टि से क्रिया के सामान्यत: दो भेद हैं─(1) सकर्मक क्रिया और (2) अकर्मक क्रिया।
सकर्मक क्रिया─`सकर्मक क्रिया' उसे कहते हैं, जिसका कर्म हो या जिसके साथ कर्म की सम्भावना हो अर्थात् जिस क्रिया के व्यापार का संचालन तो कत्र्ता से हो, पर जिसका फल या प्रभाव किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु, अर्थात् कर्म पर पड़े। उदाहरणार्थ─श्याम आम खाता है। इस वाक्य में `श्याम' कत्र्ता है, `खाने' के साथ उसका कर्तृरूप से सम्बन्ध है। प्रश्न होता है, क्या खाता है? उत्तर है, `आम'। यहाँ श्याम के खाने का फल `आम' पर अर्थात् कर्म पर पड़ता है। इसलिए खाना क्रिया सकर्मक है।
अकर्मक क्रिया─ जिन क्रियाओं का व्यापार और फल कत्र्ता पर हो, वे अकर्मक कहलाती हैं। अकर्मक क्रियाओं का `कर्म' नहीं होता। क्रिया का व्यापार और फल दूसरे पर न पड़कर कत्र्ता पर पड़ता है। उदाहरण के लिये - श्याम सोता है। इसमें सोना क्रिया अकर्मक है।
B. रचना की दृष्टि से क्रिया के सामान्यत: दो भेद हैं─(1) सकर्मक क्रिया और (2) अकर्मक क्रिया।
सकर्मक क्रिया─`सकर्मक क्रिया' उसे कहते हैं, जिसका कर्म हो या जिसके साथ कर्म की सम्भावना हो अर्थात् जिस क्रिया के व्यापार का संचालन तो कत्र्ता से हो, पर जिसका फल या प्रभाव किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु, अर्थात् कर्म पर पड़े। उदाहरणार्थ─श्याम आम खाता है। इस वाक्य में `श्याम' कत्र्ता है, `खाने' के साथ उसका कर्तृरूप से सम्बन्ध है। प्रश्न होता है, क्या खाता है? उत्तर है, `आम'। यहाँ श्याम के खाने का फल `आम' पर अर्थात् कर्म पर पड़ता है। इसलिए खाना क्रिया सकर्मक है।
अकर्मक क्रिया─ जिन क्रियाओं का व्यापार और फल कत्र्ता पर हो, वे अकर्मक कहलाती हैं। अकर्मक क्रियाओं का `कर्म' नहीं होता। क्रिया का व्यापार और फल दूसरे पर न पड़कर कत्र्ता पर पड़ता है। उदाहरण के लिये - श्याम सोता है। इसमें सोना क्रिया अकर्मक है।