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Q: ‘‘पिशङ्गमौञ्जीयुजमर्जुनच्छविं वसानमेणाजिनमञ्जनद्युति’’– अत्र वसानमित्यस्मिन् पदे क: प्रत्यय:?
  • A. ण्वुल्
  • B. ल्यप्
  • C. अण्
  • D. शानच्
Correct Answer: Option D - ‘पिशङ्गमौञ्जीयुजमर्जुनच्छविं वसानमेणाजिनमञ्जनद्युति’- अत्र वसानमित्यस्मिन् पदे ‘शानच्’ प्रत्यय:। वसानम् · वस् आच्छादने + शानच् = पहने हुए। • आत्मनेपदी धातुओं में शानच् प्रत्यय लगाये जाते है। • शानच् प्रत्यय में ‘आन’ शेष रहता है। • जब शानच् प्रत्यय का प्रयोग आत्मनेपदी भ्वादि, दिवादि, तुदादि, चुरादि गणों की धातुओं के साथ होता है, तो ‘मान’ होता है तथा अन्य गणों की आत्मनेपदी धातुओं के साथ ‘आन’ होता है। • शानच् प्रत्यय से युक्त पद कर्त्ता के विशेषण के रूप में होता है। • शानच् प्रत्यय के रूप तीनों लिङ्गों में इस प्रकार से चलते हैं। जैसे- सहमान: (पुल्लिङ्ग), सहमाना (स्त्रीलिङ्ग), सहमानम् (नपुंसकलिङ्ग) ण्वुल् प्रत्यय - सूत्र- ‘ण्वुल्तृचौ’ धातुओं से कर्त्ता अर्थ (करने वाला) में ण्वुल् प्रत्यय होता है। ण्वलु प्रत्यय में ‘ण्’ और ‘ल्’ की इत्संज्ञा के बाद ‘वु’ शेष रहता है। इस ‘वु’ के स्थान पर ‘अक्’ आदेश हो जाता है। चि + ण्वुल् = चायक: ल्यप् प्रत्यय - समासेऽनञ्पूर्वे कत्वो ल्यप् समास का प्रसंग होने पर क्त्वा प्रत्यय के स्थान पर ल्यप् प्रत्यय आदेश हो जाता है, लेकिन नञ् तत्पुरुष समास के प्रसंग में यह ल्यप् आदेश नहीं होता है। ल्यप् प्रत्यय में ल् और प् की इत्संज्ञा के बाद केवल ‘य’ शेष रहता है। जैसे- प्र+अद्+ल्यप् = प्रजग्ध्य अण् प्रत्यय- • अण् प्रत्यय में ‘अ’ शेष रहता है। • णित् होने के कारण आदिवृद्धि होती है। • यह अन्य अर्थों का विधायक है। • यह प्रातिपदिकों से संयुक्त किया जाता है। • संख्यापूर्ण, सम्पूर्ण तथा भद्रपूर्ण मातृ शब्द को अपत्य अर्थ में ह्रस्व उकार अन्तादेश होता है और तद्धित संज्ञक अण् प्रत्यय भी लगाये जाते हैं।
D. ‘पिशङ्गमौञ्जीयुजमर्जुनच्छविं वसानमेणाजिनमञ्जनद्युति’- अत्र वसानमित्यस्मिन् पदे ‘शानच्’ प्रत्यय:। वसानम् · वस् आच्छादने + शानच् = पहने हुए। • आत्मनेपदी धातुओं में शानच् प्रत्यय लगाये जाते है। • शानच् प्रत्यय में ‘आन’ शेष रहता है। • जब शानच् प्रत्यय का प्रयोग आत्मनेपदी भ्वादि, दिवादि, तुदादि, चुरादि गणों की धातुओं के साथ होता है, तो ‘मान’ होता है तथा अन्य गणों की आत्मनेपदी धातुओं के साथ ‘आन’ होता है। • शानच् प्रत्यय से युक्त पद कर्त्ता के विशेषण के रूप में होता है। • शानच् प्रत्यय के रूप तीनों लिङ्गों में इस प्रकार से चलते हैं। जैसे- सहमान: (पुल्लिङ्ग), सहमाना (स्त्रीलिङ्ग), सहमानम् (नपुंसकलिङ्ग) ण्वुल् प्रत्यय - सूत्र- ‘ण्वुल्तृचौ’ धातुओं से कर्त्ता अर्थ (करने वाला) में ण्वुल् प्रत्यय होता है। ण्वलु प्रत्यय में ‘ण्’ और ‘ल्’ की इत्संज्ञा के बाद ‘वु’ शेष रहता है। इस ‘वु’ के स्थान पर ‘अक्’ आदेश हो जाता है। चि + ण्वुल् = चायक: ल्यप् प्रत्यय - समासेऽनञ्पूर्वे कत्वो ल्यप् समास का प्रसंग होने पर क्त्वा प्रत्यय के स्थान पर ल्यप् प्रत्यय आदेश हो जाता है, लेकिन नञ् तत्पुरुष समास के प्रसंग में यह ल्यप् आदेश नहीं होता है। ल्यप् प्रत्यय में ल् और प् की इत्संज्ञा के बाद केवल ‘य’ शेष रहता है। जैसे- प्र+अद्+ल्यप् = प्रजग्ध्य अण् प्रत्यय- • अण् प्रत्यय में ‘अ’ शेष रहता है। • णित् होने के कारण आदिवृद्धि होती है। • यह अन्य अर्थों का विधायक है। • यह प्रातिपदिकों से संयुक्त किया जाता है। • संख्यापूर्ण, सम्पूर्ण तथा भद्रपूर्ण मातृ शब्द को अपत्य अर्थ में ह्रस्व उकार अन्तादेश होता है और तद्धित संज्ञक अण् प्रत्यय भी लगाये जाते हैं।

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‘पिशङ्गमौञ्जीयुजमर्जुनच्छविं वसानमेणाजिनमञ्जनद्युति’- अत्र वसानमित्यस्मिन् पदे ‘शानच्’ प्रत्यय:। वसानम् · वस् आच्छादने + शानच् = पहने हुए। • आत्मनेपदी धातुओं में शानच् प्रत्यय लगाये जाते है। • शानच् प्रत्यय में ‘आन’ शेष रहता है। • जब शानच् प्रत्यय का प्रयोग आत्मनेपदी भ्वादि, दिवादि, तुदादि, चुरादि गणों की धातुओं के साथ होता है, तो ‘मान’ होता है तथा अन्य गणों की आत्मनेपदी धातुओं के साथ ‘आन’ होता है। • शानच् प्रत्यय से युक्त पद कर्त्ता के विशेषण के रूप में होता है। • शानच् प्रत्यय के रूप तीनों लिङ्गों में इस प्रकार से चलते हैं। जैसे- सहमान: (पुल्लिङ्ग), सहमाना (स्त्रीलिङ्ग), सहमानम् (नपुंसकलिङ्ग) ण्वुल् प्रत्यय - सूत्र- ‘ण्वुल्तृचौ’ धातुओं से कर्त्ता अर्थ (करने वाला) में ण्वुल् प्रत्यय होता है। ण्वलु प्रत्यय में ‘ण्’ और ‘ल्’ की इत्संज्ञा के बाद ‘वु’ शेष रहता है। इस ‘वु’ के स्थान पर ‘अक्’ आदेश हो जाता है। चि + ण्वुल् = चायक: ल्यप् प्रत्यय - समासेऽनञ्पूर्वे कत्वो ल्यप् समास का प्रसंग होने पर क्त्वा प्रत्यय के स्थान पर ल्यप् प्रत्यय आदेश हो जाता है, लेकिन नञ् तत्पुरुष समास के प्रसंग में यह ल्यप् आदेश नहीं होता है। ल्यप् प्रत्यय में ल् और प् की इत्संज्ञा के बाद केवल ‘य’ शेष रहता है। जैसे- प्र+अद्+ल्यप् = प्रजग्ध्य अण् प्रत्यय- • अण् प्रत्यय में ‘अ’ शेष रहता है। • णित् होने के कारण आदिवृद्धि होती है। • यह अन्य अर्थों का विधायक है। • यह प्रातिपदिकों से संयुक्त किया जाता है। • संख्यापूर्ण, सम्पूर्ण तथा भद्रपूर्ण मातृ शब्द को अपत्य अर्थ में ह्रस्व उकार अन्तादेश होता है और तद्धित संज्ञक अण् प्रत्यय भी लगाये जाते हैं।