Correct Answer:
Option B - ‘‘प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिव:’’ यह भरतवाक्य अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक में प्रयुक्त हुआ है। भरतवाक्य का प्रयोग ग्रन्थ की समाप्ति पर होता है। अभिज्ञान का भरतवाक्य इस प्रकार है-
‘‘प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिव:
सरस्वती श्रुतमहतां महीयताम् ।
ममापि च क्षपयतु नीललोहित:
पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभू:।।’’
अर्थात् -राजा प्रजा के हित के लिए प्रयत्नशील हो। ज्ञान गरिष्ठ कवियों की वाणी (कृति) का पूर्ण सत्कार हो। सर्व शक्तिमान स्वयंभू शिव मेरे पुनर्जन्म को निवृत्त कर दें।
B. ‘‘प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिव:’’ यह भरतवाक्य अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक में प्रयुक्त हुआ है। भरतवाक्य का प्रयोग ग्रन्थ की समाप्ति पर होता है। अभिज्ञान का भरतवाक्य इस प्रकार है-
‘‘प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिव:
सरस्वती श्रुतमहतां महीयताम् ।
ममापि च क्षपयतु नीललोहित:
पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभू:।।’’
अर्थात् -राजा प्रजा के हित के लिए प्रयत्नशील हो। ज्ञान गरिष्ठ कवियों की वाणी (कृति) का पूर्ण सत्कार हो। सर्व शक्तिमान स्वयंभू शिव मेरे पुनर्जन्म को निवृत्त कर दें।