search
Q: प्राथमिक स्तर पर भाषा शिक्षण का उद्देश्य है–
  • A. विषय सामग्री के माध्यम से केवल कठिन शब्दों के अर्थ जानना।
  • B. दूसरे के विचारों को शब्दश: दोहराने मात्र की कुशलता का विकास।
  • C. पठन के द्वारा ज्ञानार्जन एवं आनंद प्राप्ति में समर्थ बनाना।
  • D. विभिन्न साहित्यिक विधाओं की रचनाओं और रचनाकारों के नाम याद करना।
Correct Answer: Option C - प्राथमिक स्तर पर भाषा शिक्षण का उद्देश्य पठन के द्वारा ज्ञानार्जन एवं आनन्द प्राप्ति में समर्थ बनाना है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 के अनुसार पठन भाषा शिक्षण का महत्वपूर्ण अवयव माना जाता है। स्कूली पाठ्यक्रम सूचनाओं और रटंत पाठों से इतने भरे होते हैं कि सिर्फ पढ़ने के लिए पढ़ने का आनन्द कहीं दूर छूट जाता है। पढ़ने की संस्कृति के विकास के क्रम में वैयक्तिक पठन को प्रोत्साहित किये जाने की आवश्यकता है और शिक्षकों को इस संस्कृति का हिस्सा बनकर स्वयं उदाहरण पेश करना चाहिए। पढ़ना, पढ़कर समझने और उस पर प्रतिक्रिया करने की एक प्रक्रिया है। दूसरे शब्दों में, हम यह भी कह सकते हैं कि पढ़ना बुनियादी तौर से एक अर्थवान गतिविधि है। इसलिए पढ़ने का उद्देश्य पठन के द्वारा ज्ञानार्जन एवं आनन्द प्राप्ति में समर्थ बनाना होनी चाहिए।
C. प्राथमिक स्तर पर भाषा शिक्षण का उद्देश्य पठन के द्वारा ज्ञानार्जन एवं आनन्द प्राप्ति में समर्थ बनाना है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 के अनुसार पठन भाषा शिक्षण का महत्वपूर्ण अवयव माना जाता है। स्कूली पाठ्यक्रम सूचनाओं और रटंत पाठों से इतने भरे होते हैं कि सिर्फ पढ़ने के लिए पढ़ने का आनन्द कहीं दूर छूट जाता है। पढ़ने की संस्कृति के विकास के क्रम में वैयक्तिक पठन को प्रोत्साहित किये जाने की आवश्यकता है और शिक्षकों को इस संस्कृति का हिस्सा बनकर स्वयं उदाहरण पेश करना चाहिए। पढ़ना, पढ़कर समझने और उस पर प्रतिक्रिया करने की एक प्रक्रिया है। दूसरे शब्दों में, हम यह भी कह सकते हैं कि पढ़ना बुनियादी तौर से एक अर्थवान गतिविधि है। इसलिए पढ़ने का उद्देश्य पठन के द्वारा ज्ञानार्जन एवं आनन्द प्राप्ति में समर्थ बनाना होनी चाहिए।

Explanations:

प्राथमिक स्तर पर भाषा शिक्षण का उद्देश्य पठन के द्वारा ज्ञानार्जन एवं आनन्द प्राप्ति में समर्थ बनाना है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 के अनुसार पठन भाषा शिक्षण का महत्वपूर्ण अवयव माना जाता है। स्कूली पाठ्यक्रम सूचनाओं और रटंत पाठों से इतने भरे होते हैं कि सिर्फ पढ़ने के लिए पढ़ने का आनन्द कहीं दूर छूट जाता है। पढ़ने की संस्कृति के विकास के क्रम में वैयक्तिक पठन को प्रोत्साहित किये जाने की आवश्यकता है और शिक्षकों को इस संस्कृति का हिस्सा बनकर स्वयं उदाहरण पेश करना चाहिए। पढ़ना, पढ़कर समझने और उस पर प्रतिक्रिया करने की एक प्रक्रिया है। दूसरे शब्दों में, हम यह भी कह सकते हैं कि पढ़ना बुनियादी तौर से एक अर्थवान गतिविधि है। इसलिए पढ़ने का उद्देश्य पठन के द्वारा ज्ञानार्जन एवं आनन्द प्राप्ति में समर्थ बनाना होनी चाहिए।