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Q: ‘प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा’ इत्यस्मिन् पद्यांशे कोऽलङ्लकार:?
  • A. उपमा
  • B. रूपकम्
  • C. उत्प्रेक्षा
  • D. दीपकम्
Correct Answer: Option C - ‘प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा’ इत्यस्मिन् पद्यांशे उत्प्रेक्षा अलंकार :। यह सूक्ति महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थ अज्र् से उद्धृत है। उत्प्रेक्षा अलंकार - ‘सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेनयत्।’ अर्थात् प्रकृत अर्थात् वर्ण्य उपमेय की सम अर्थात् उपमान के साथ सम्भावना की जाए तो वहाँ उत्प्रेक्षा होता है। उदा.- ‘अर्थोहि कन्या परकीय एव तामद्य सम्प्रेष्य परिगृहीतु:। जातो ममायं विशद: प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा।।
C. ‘प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा’ इत्यस्मिन् पद्यांशे उत्प्रेक्षा अलंकार :। यह सूक्ति महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थ अज्र् से उद्धृत है। उत्प्रेक्षा अलंकार - ‘सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेनयत्।’ अर्थात् प्रकृत अर्थात् वर्ण्य उपमेय की सम अर्थात् उपमान के साथ सम्भावना की जाए तो वहाँ उत्प्रेक्षा होता है। उदा.- ‘अर्थोहि कन्या परकीय एव तामद्य सम्प्रेष्य परिगृहीतु:। जातो ममायं विशद: प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा।।

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‘प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा’ इत्यस्मिन् पद्यांशे उत्प्रेक्षा अलंकार :। यह सूक्ति महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थ अज्र् से उद्धृत है। उत्प्रेक्षा अलंकार - ‘सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेनयत्।’ अर्थात् प्रकृत अर्थात् वर्ण्य उपमेय की सम अर्थात् उपमान के साथ सम्भावना की जाए तो वहाँ उत्प्रेक्षा होता है। उदा.- ‘अर्थोहि कन्या परकीय एव तामद्य सम्प्रेष्य परिगृहीतु:। जातो ममायं विशद: प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा।।