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Q: ‘प्रसन्न पद-नव्यार्थ युक्त्युद्बोध विधायिनी। स्फुरन्ती सत्कवेर्बुद्धि: प्रतिभा सर्वतोमुखी।।’ -उक्त कथन किसका है?
  • A. मम्मट
  • B. वाग्भट
  • C. रुद्रट
  • D. विश्वनाथ
Correct Answer: Option B - ‘प्रसन्न पद-नव्यार्थ युक्त्युद्बोध विधायिनी। स्फुरन्ती सत्कवेर्बुद्धि: प्रतिभा सर्वतोमुखी।।’ उक्त कथन संस्कृत आचार्य वाग्भट का है। वाग्भट ने नवीनता और उसकी ललित पदों में अभिव्यक्ति, दोनों को सर्वतोमुखी कहा है। इस प्रकार पूर्ण युक्तियों का उद्बोधन करने वाली सभी दिशाओं में फैलने वाली चमत्कारपूर्ण बुद्धि को प्रतिभा कहते हैं। प्रतिभा अथवा शक्ति को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। इसके संदर्भ में आचार्यों के मत निम्नलिखित हैं- ‘‘प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता।’’ - भट्टतौत (अर्थ या नव्य - विषय को नए - नए रूप में प्रकट करने वाली प्रज्ञा, प्रतिभा है।) ‘‘प्रतिभा अपूर्ववस्तु निर्माणक्षमा प्रज्ञा।।’’ - अभिनवगुप्त (अपूर्व वस्तु के निर्माण में सक्षम प्रज्ञा, प्रतिभा है) ‘‘प्राक्टनाघटन संस्कार परिपाक प्रौढ़ा प्रतिभा काचिदेव कविशक्ति:।’’ - कुंतक (पूर्व एवं वर्तमान जन्म के संस्कारों से मिली कवित्व शक्ति प्रतिभा है।) ‘‘शक्ति: कवित्वबीजरूप: संस्कार विशेष:।’’ - मम्मट
B. ‘प्रसन्न पद-नव्यार्थ युक्त्युद्बोध विधायिनी। स्फुरन्ती सत्कवेर्बुद्धि: प्रतिभा सर्वतोमुखी।।’ उक्त कथन संस्कृत आचार्य वाग्भट का है। वाग्भट ने नवीनता और उसकी ललित पदों में अभिव्यक्ति, दोनों को सर्वतोमुखी कहा है। इस प्रकार पूर्ण युक्तियों का उद्बोधन करने वाली सभी दिशाओं में फैलने वाली चमत्कारपूर्ण बुद्धि को प्रतिभा कहते हैं। प्रतिभा अथवा शक्ति को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। इसके संदर्भ में आचार्यों के मत निम्नलिखित हैं- ‘‘प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता।’’ - भट्टतौत (अर्थ या नव्य - विषय को नए - नए रूप में प्रकट करने वाली प्रज्ञा, प्रतिभा है।) ‘‘प्रतिभा अपूर्ववस्तु निर्माणक्षमा प्रज्ञा।।’’ - अभिनवगुप्त (अपूर्व वस्तु के निर्माण में सक्षम प्रज्ञा, प्रतिभा है) ‘‘प्राक्टनाघटन संस्कार परिपाक प्रौढ़ा प्रतिभा काचिदेव कविशक्ति:।’’ - कुंतक (पूर्व एवं वर्तमान जन्म के संस्कारों से मिली कवित्व शक्ति प्रतिभा है।) ‘‘शक्ति: कवित्वबीजरूप: संस्कार विशेष:।’’ - मम्मट

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‘प्रसन्न पद-नव्यार्थ युक्त्युद्बोध विधायिनी। स्फुरन्ती सत्कवेर्बुद्धि: प्रतिभा सर्वतोमुखी।।’ उक्त कथन संस्कृत आचार्य वाग्भट का है। वाग्भट ने नवीनता और उसकी ललित पदों में अभिव्यक्ति, दोनों को सर्वतोमुखी कहा है। इस प्रकार पूर्ण युक्तियों का उद्बोधन करने वाली सभी दिशाओं में फैलने वाली चमत्कारपूर्ण बुद्धि को प्रतिभा कहते हैं। प्रतिभा अथवा शक्ति को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। इसके संदर्भ में आचार्यों के मत निम्नलिखित हैं- ‘‘प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता।’’ - भट्टतौत (अर्थ या नव्य - विषय को नए - नए रूप में प्रकट करने वाली प्रज्ञा, प्रतिभा है।) ‘‘प्रतिभा अपूर्ववस्तु निर्माणक्षमा प्रज्ञा।।’’ - अभिनवगुप्त (अपूर्व वस्तु के निर्माण में सक्षम प्रज्ञा, प्रतिभा है) ‘‘प्राक्टनाघटन संस्कार परिपाक प्रौढ़ा प्रतिभा काचिदेव कविशक्ति:।’’ - कुंतक (पूर्व एवं वर्तमान जन्म के संस्कारों से मिली कवित्व शक्ति प्रतिभा है।) ‘‘शक्ति: कवित्वबीजरूप: संस्कार विशेष:।’’ - मम्मट