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Q: ‘प्रहृष्टा: गृहेभ्य: निष्क्रामन्त:’ इत्यत्र ‘निष्क्रामन्त:’ इत्यस्य पदस्य का व्युत्पत्तिर्भवति?
  • A. निर् + क्रम् + तृच
  • B. निर् + क्रम् + शतृ
  • C. निर् + क्रम् + लुट्
  • D. निर् + क्रम् + शानच्
Correct Answer: Option B - ‘प्रहृष्टा: गृहेभ्य: निष्क्रामन्त: इत्यत्र ‘निष्क्रामन्त:’ ‘इत्यस्य पदस्य व्युत्पत्तिर्भवति - निर् + क्रम् + शतृ ‘प्रहृष्टा: गृहेभ्य: निष्क्रामन्त: ‘निष्क्रामन्त:’ इस पद की व्युत्पत्ति है– निर् + क्रम् + शतृ शतृ परस्मैपदी धातुओं के साथ प्रयुक्त होता है। ‘विद्’ धातु के बाद शतृ प्रत्यय जुड़ता है और शतृ के ही अर्थ में विकल्प से ‘वसु’ आदेश हो जाता है। इस प्रकार – विद् + शतृ · विदन् विद् वसु · विद्वस्
B. ‘प्रहृष्टा: गृहेभ्य: निष्क्रामन्त: इत्यत्र ‘निष्क्रामन्त:’ ‘इत्यस्य पदस्य व्युत्पत्तिर्भवति - निर् + क्रम् + शतृ ‘प्रहृष्टा: गृहेभ्य: निष्क्रामन्त: ‘निष्क्रामन्त:’ इस पद की व्युत्पत्ति है– निर् + क्रम् + शतृ शतृ परस्मैपदी धातुओं के साथ प्रयुक्त होता है। ‘विद्’ धातु के बाद शतृ प्रत्यय जुड़ता है और शतृ के ही अर्थ में विकल्प से ‘वसु’ आदेश हो जाता है। इस प्रकार – विद् + शतृ · विदन् विद् वसु · विद्वस्

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‘प्रहृष्टा: गृहेभ्य: निष्क्रामन्त: इत्यत्र ‘निष्क्रामन्त:’ ‘इत्यस्य पदस्य व्युत्पत्तिर्भवति - निर् + क्रम् + शतृ ‘प्रहृष्टा: गृहेभ्य: निष्क्रामन्त: ‘निष्क्रामन्त:’ इस पद की व्युत्पत्ति है– निर् + क्रम् + शतृ शतृ परस्मैपदी धातुओं के साथ प्रयुक्त होता है। ‘विद्’ धातु के बाद शतृ प्रत्यय जुड़ता है और शतृ के ही अर्थ में विकल्प से ‘वसु’ आदेश हो जाता है। इस प्रकार – विद् + शतृ · विदन् विद् वसु · विद्वस्