Correct Answer:
Option A - सिक्कों के नियमित प्रचलन से पूर्व, वैदिक काल से ही निष्क गले में पहनने वाला एक सोने का आभूषण होता था। कालान्तर में यह व्यापारिक लेन-देन में प्रयुक्त होने लगा। मौर्य युग तक आते-आते व्यापार-व्यवसाय में नियमित सिक्कों का प्रचलन हो चुका था, सिक्के सोने-चाँदी तथा ताँबे के बने होते थे। इन सिक्कों को `निष्क' और `सुवर्ण' कहा जाता था, चाँदी के सिक्के को कार्षापण या धरण कहा जाता था। ताँबे के सिक्के माषक कहलाते थे। छोटे-छोटे ताँबे के सिक्के `काकणि' कहे जाते थे।
A. सिक्कों के नियमित प्रचलन से पूर्व, वैदिक काल से ही निष्क गले में पहनने वाला एक सोने का आभूषण होता था। कालान्तर में यह व्यापारिक लेन-देन में प्रयुक्त होने लगा। मौर्य युग तक आते-आते व्यापार-व्यवसाय में नियमित सिक्कों का प्रचलन हो चुका था, सिक्के सोने-चाँदी तथा ताँबे के बने होते थे। इन सिक्कों को `निष्क' और `सुवर्ण' कहा जाता था, चाँदी के सिक्के को कार्षापण या धरण कहा जाता था। ताँबे के सिक्के माषक कहलाते थे। छोटे-छोटे ताँबे के सिक्के `काकणि' कहे जाते थे।