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Q: न्याय: कुत्र प्रवर्तते?
  • A. उपलब्धेऽर्थे
  • B. अनुपलब्धेऽर्थे
  • C. निर्णीतेऽर्थे
  • D. सन्दिग्धेऽर्थे
Correct Answer: Option D - न्याय: सन्दिग्धेऽर्थे प्रवर्तते। अर्थात् जहाँ सन्देह होता है वहाँ तर्क काम आता है। न्याय दर्शन भारतीय दर्शन के षडदर्शनों में से एक प्रमुख आस्तिक दर्शन है। इस दर्शन के प्रवर्तक महर्षि अक्षपाद गौतम हैं, न्यायसूत्र इस दर्शन का प्रमुख ग्रंथ है। इस दर्शन को साहित्य के दृष्टिकोण से दो भागों में विभाजित किया जाता है। (1) प्राचीन न्याय- गौतम, (2) नव्य-न्याय - गंगेश उपाध्याय
D. न्याय: सन्दिग्धेऽर्थे प्रवर्तते। अर्थात् जहाँ सन्देह होता है वहाँ तर्क काम आता है। न्याय दर्शन भारतीय दर्शन के षडदर्शनों में से एक प्रमुख आस्तिक दर्शन है। इस दर्शन के प्रवर्तक महर्षि अक्षपाद गौतम हैं, न्यायसूत्र इस दर्शन का प्रमुख ग्रंथ है। इस दर्शन को साहित्य के दृष्टिकोण से दो भागों में विभाजित किया जाता है। (1) प्राचीन न्याय- गौतम, (2) नव्य-न्याय - गंगेश उपाध्याय

Explanations:

न्याय: सन्दिग्धेऽर्थे प्रवर्तते। अर्थात् जहाँ सन्देह होता है वहाँ तर्क काम आता है। न्याय दर्शन भारतीय दर्शन के षडदर्शनों में से एक प्रमुख आस्तिक दर्शन है। इस दर्शन के प्रवर्तक महर्षि अक्षपाद गौतम हैं, न्यायसूत्र इस दर्शन का प्रमुख ग्रंथ है। इस दर्शन को साहित्य के दृष्टिकोण से दो भागों में विभाजित किया जाता है। (1) प्राचीन न्याय- गौतम, (2) नव्य-न्याय - गंगेश उपाध्याय