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Q: निर्देश (प्रश्न संख्या 81 से 85 तक) निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढि़ए और पूछे गए प्रश्नों के सही विकल्प चुनकर उत्तर-पत्रक में अंकित कीजिए। आचरण की सम्भ्यतामय भाषा सदा मौन रहती है। इस भाषा का निघण्टु धवल पत्रों वाला है। सभ्यता चरण प्रखर नाद करता हुआ भी मौन है, व्याख्यान देता हुआ भी गुप्त है, राग गाता हुआ भी सुर के भीतर है। मृदु वचन की मिठास में आचरण की सभ्यता मौन रूप से घुली है। नम्रता, दया, प्रेम और उदारता भी आचरण की भाषा हैं। मनुष्य के जीवन पर इस मौन व्याख्यान का प्रभाव क्षणिक अथवा स्वल्पजीवी नहीं, अपितु सनातन होता है। बर्फ का दुपट्टा बाँधे हिमालय इस समय तो अति सुन्दर मालूम होता है, परन्तु प्रकृति ने अगणित शताब्दियों के परिश्रम से रेत का एक-एक कण समुद्र में डुबो-डुबो कर इस हिमालय के दर्शन कराए हैं। आचरण भी हिमालय की तरह ऊँचे कलश वाला मन्दिर है। यह वह आम का पेड़ नहीं जिसे जादूगर क्षण भर में हथेली पर जमा दे। इसके बनने में अनन्त काल लगा है। पृथ्वी बन गई, सूर्य बन गया, नील-पिंगल संध्या बन गई, तारागण आकाश में दौड़ने लगे परन्तु अभी तक आचरण सुन्दर रूप से पूर्ण दर्शन नहीं हुए। कहीं-कहीं उसकी छटा अवश्य दिखाई देती है। ‘निघण्टु’ शब्द का अर्थ है
  • A. बहुभाषा कोश
  • B. पर्यायवाची कोश
  • C. द्विभाषा
  • D. उपर्युक्त में से एक से अधिक
  • E. उपर्युक्त में से कोई नहीं
Correct Answer: Option B - ‘निघण्टु’ शब्द का अर्थ `पर्यायवाची कोश' है। `निघण्टु' संस्कृत का प्राचीन शब्दकोश है। इसमें वैदिक साहित्य में प्राप्त शब्दों का संग्रह है।
B. ‘निघण्टु’ शब्द का अर्थ `पर्यायवाची कोश' है। `निघण्टु' संस्कृत का प्राचीन शब्दकोश है। इसमें वैदिक साहित्य में प्राप्त शब्दों का संग्रह है।

Explanations:

‘निघण्टु’ शब्द का अर्थ `पर्यायवाची कोश' है। `निघण्टु' संस्कृत का प्राचीन शब्दकोश है। इसमें वैदिक साहित्य में प्राप्त शब्दों का संग्रह है।