Correct Answer:
Option A - ‘न्यवेदयत्’ इत्यस्मिं पदे ‘यण् संधि :’ वर्तते। न्यवेदयत् इस पद में यण् सन्धि है।
यण संधि - इकोयणचि-इक: स्थाने यणादेश: भवति अचि परत: संहितायांं विषये। इक् के स्थान में यण् आदेश हो परे अच् रहते।
उदाहरण- नदी + अत्र = नद्यत्र, नि + अवेदयत् = न्यवेदयत्।
गुण संधि - आदगुण :-यदि अ या आ के परे इ, उ, ऋ तथा लृ आवे तो पूर्व और पर के स्थान में गुण एकादेश (ए, ओ, अर्, अल्) हो जाता है।
उदाहरण- उप + इन्द्र: · उपेन्द्र:, नर + ईश: · नरेश:।
वृृद्धि संधि वृद्धिरेचि- अ/आ के परे ए/ऐ, ओ/औ आवे तो पूर्व और पर के स्थान पर वृद्धि (ऐ, औ) एकादेश हो जाता है।
उदाहरण- तत्र + एव = तत्रैव, महा + औदार्यम् = महौदार्यम्।
पूर्वरूप संधि - एङ: पदान्तादति - यदि पद के अन्त में ए या ओ के परे ह्रस्व ‘अ’ आवे तो उसको पूर्वरूप (ऽ) हो जाता है।
उदाहरण-रमे + अत्र = रमेऽत्र, पाठको + अवदत् = पाठकोऽवदत्।
A. ‘न्यवेदयत्’ इत्यस्मिं पदे ‘यण् संधि :’ वर्तते। न्यवेदयत् इस पद में यण् सन्धि है।
यण संधि - इकोयणचि-इक: स्थाने यणादेश: भवति अचि परत: संहितायांं विषये। इक् के स्थान में यण् आदेश हो परे अच् रहते।
उदाहरण- नदी + अत्र = नद्यत्र, नि + अवेदयत् = न्यवेदयत्।
गुण संधि - आदगुण :-यदि अ या आ के परे इ, उ, ऋ तथा लृ आवे तो पूर्व और पर के स्थान में गुण एकादेश (ए, ओ, अर्, अल्) हो जाता है।
उदाहरण- उप + इन्द्र: · उपेन्द्र:, नर + ईश: · नरेश:।
वृृद्धि संधि वृद्धिरेचि- अ/आ के परे ए/ऐ, ओ/औ आवे तो पूर्व और पर के स्थान पर वृद्धि (ऐ, औ) एकादेश हो जाता है।
उदाहरण- तत्र + एव = तत्रैव, महा + औदार्यम् = महौदार्यम्।
पूर्वरूप संधि - एङ: पदान्तादति - यदि पद के अन्त में ए या ओ के परे ह्रस्व ‘अ’ आवे तो उसको पूर्वरूप (ऽ) हो जाता है।
उदाहरण-रमे + अत्र = रमेऽत्र, पाठको + अवदत् = पाठकोऽवदत्।