Correct Answer:
Option C - वायसशृगालौ अस्मिन् पदे ‘द्वन्द्व:’ समास: अस्ति। अर्थात् वायसशृगालौ नामक पद में ‘द्वन्द्व’ समास है। जब ऐसे दो या दो से अधिक पद रखे जाते हैं जो ‘च’ शब्द से जुड़े हुए हो, तो वहाँ पर द्वन्द्व समास होता है। इसका सूत्र चार्थे द्वन्द्व: 2/2/21 है। वायसशृगालौ का समास विग्रह होगा-वायसश्च शृगालश्च · वायसशृगालौ।
अव्ययीभाव– ‘अव्ययीभाव’ शब्द का यौगिक अर्थ है जो अव्यय नहीं था, उसका अव्यय हो जाना। इस समास में प्राय: दो पद रहते हैं-इनमें से प्रथम प्राय: अव्यय होता है और दूसरा संज्ञा। दोनों मिलकर अव्यय हो जाते हैं। इसके रूप नहीं चलते हैं। अन्तिम शब्द का नपुंसकलिङ्ग (अव्ययीभावश्च/2/4/18) के एकवचन में जैसा रूप होता है, वही रूप अव्ययीभाव समास का हो जाता है और वही नित्य रहता है। यथा- यथाकामम् · काममनतिक्रम्य इति यथाकामम् (इच्छानुसार)।
तत्पुरुष– तत्पुरुष उस समास को कहते हैं, जिसमें प्रथम शब्द द्वितीय शब्द की विशेषता बताये। इसके दो अर्थ होते हैं- (1) तस्यपुरुष:· तत्पुरुष: (2) स: पुरुष: · तत्पुरुष:। इन दो अर्थों के अनुसार ही तत्पुरुष के दो मुख्य भेद हैं। (1) व्यधिकरण
अर्थात् - जिस समास में प्रथम शब्द की विभक्ति और दूसरे शब्द की विभक्ति भिन्न-भिन्न हों (2) समानाधिकरण अर्थात् जिसमें प्रथम शब्द की विभक्ति और दूसरे शब्द की विभक्ति एक ही हो। यथा – राज्ञ: पुरुष: · राजपुरुष: (यहाँ ‘राज्ञ:’ एक प्रकार से पुरुष का विशेषण है) में व्यधिकरण तथा कृष्ण: सर्प: · कृष्णसर्प: (यहाँ ‘कृष्ण’ शब्द ‘सर्प:’ का विशेषण है) समानाधिकरण तत्पुरुष समास है।
C. वायसशृगालौ अस्मिन् पदे ‘द्वन्द्व:’ समास: अस्ति। अर्थात् वायसशृगालौ नामक पद में ‘द्वन्द्व’ समास है। जब ऐसे दो या दो से अधिक पद रखे जाते हैं जो ‘च’ शब्द से जुड़े हुए हो, तो वहाँ पर द्वन्द्व समास होता है। इसका सूत्र चार्थे द्वन्द्व: 2/2/21 है। वायसशृगालौ का समास विग्रह होगा-वायसश्च शृगालश्च · वायसशृगालौ।
अव्ययीभाव– ‘अव्ययीभाव’ शब्द का यौगिक अर्थ है जो अव्यय नहीं था, उसका अव्यय हो जाना। इस समास में प्राय: दो पद रहते हैं-इनमें से प्रथम प्राय: अव्यय होता है और दूसरा संज्ञा। दोनों मिलकर अव्यय हो जाते हैं। इसके रूप नहीं चलते हैं। अन्तिम शब्द का नपुंसकलिङ्ग (अव्ययीभावश्च/2/4/18) के एकवचन में जैसा रूप होता है, वही रूप अव्ययीभाव समास का हो जाता है और वही नित्य रहता है। यथा- यथाकामम् · काममनतिक्रम्य इति यथाकामम् (इच्छानुसार)।
तत्पुरुष– तत्पुरुष उस समास को कहते हैं, जिसमें प्रथम शब्द द्वितीय शब्द की विशेषता बताये। इसके दो अर्थ होते हैं- (1) तस्यपुरुष:· तत्पुरुष: (2) स: पुरुष: · तत्पुरुष:। इन दो अर्थों के अनुसार ही तत्पुरुष के दो मुख्य भेद हैं। (1) व्यधिकरण
अर्थात् - जिस समास में प्रथम शब्द की विभक्ति और दूसरे शब्द की विभक्ति भिन्न-भिन्न हों (2) समानाधिकरण अर्थात् जिसमें प्रथम शब्द की विभक्ति और दूसरे शब्द की विभक्ति एक ही हो। यथा – राज्ञ: पुरुष: · राजपुरुष: (यहाँ ‘राज्ञ:’ एक प्रकार से पुरुष का विशेषण है) में व्यधिकरण तथा कृष्ण: सर्प: · कृष्णसर्प: (यहाँ ‘कृष्ण’ शब्द ‘सर्प:’ का विशेषण है) समानाधिकरण तत्पुरुष समास है।