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Q: निर्देश: अधोलिखितं गद्यांशं पठित्वा तदनन्तरं प्रदत्तप्रश्नानां (प्रश्न संख्या 249-257) विकल्पात्मकोत्तरेषु समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत। कस्मिंश्चिदरण्ये वसति स्म कोऽपि सिंह:। पर्वतस्य गुहायां स: दिवा अस्वपत् रात्रौ च वने इतस्तत: परिभ्रमन् पशूनभक्षयत्। कदाचित् प्रभूतमाहारं कृत्वा अयं सिंह: कस्यचित् वृक्षस्य छायायां सुखेन अस्वपत्। तत: बहव: मूषका: बिलात् निर्गत्य सानन्दं सिंहस्य शरीरे अनृत्यन् इतस्तत:। तेन पीडित: सिंह: प्रबुद्ध: अभवत्। तं प्रबुद्धं दृष्टवा पलायन्ते सर्वे मूषका: बिलम्। तेषां कमपि मूषकमगृह्णात् सिंह: करतलेन। तदा स: मूषक: आर्तस्वरेण अवदत् – ‘भो महाराज! त्वं किल पशूनां राजा। प्रसिद्ध: तव पराक्रम:। अहं तु क्षुद्र: जन्तु:। मम अपराधं तावत् क्षमस्व। मां मा जहि। मयि दयां कुरु। कदाचिदहं करिष्यामि तव साहाय्यम्। इति। एतद् तस्य आर्तवचनं श्रुत्वा सिंह: तममुञ्चत्। सिंह: केन पीडित: आसीत्।
  • A. मूषकाणां नृत्येन
  • B. धावनेन
  • C. मूषकेन
  • D. बुभुक्षया
Correct Answer: Option A - सिंह मूषक के नृत्य से दु:खी हुआ। सिंह सो रहा था उसकी गहरी निद्रा के बीच मूषक अपनी बिलों से निकलकर उसके ऊपर उछल-कूद करने लगे जिससे उसकी निद्रा में बाधा पहुंची।
A. सिंह मूषक के नृत्य से दु:खी हुआ। सिंह सो रहा था उसकी गहरी निद्रा के बीच मूषक अपनी बिलों से निकलकर उसके ऊपर उछल-कूद करने लगे जिससे उसकी निद्रा में बाधा पहुंची।

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सिंह मूषक के नृत्य से दु:खी हुआ। सिंह सो रहा था उसकी गहरी निद्रा के बीच मूषक अपनी बिलों से निकलकर उसके ऊपर उछल-कूद करने लगे जिससे उसकी निद्रा में बाधा पहुंची।