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Q: निर्देश (76-84): निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सही। सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए। गुरु-शिष्य परंपरा में शिष्य के साथ गुरु का नाम पहले आता है। यह अमुक गुरु का शिष्य है– ऐसा कहा जाता है। गुरु अपने एक-एक शब्द से शिष्य में अवतरित होता है। जो शिष्य पूरी तरह से अपने गुरू को समर्पित है, उसके जीवन में एक समय आता है, जब वह गुरू की आराधना और उपासना करते-करते गुरुमय हो जाता है। शिष्य की वृत्ति सद्गुुरू में घुल-मिल जाती है। उनकी प्रत्येक चेष्टा में, हावभाव में, वाणी में गुरू का ही प्रतिबिंब नजर आता है। इतना ही नहीं, उसकी आकृति भी गुरू जैसी हो जाती है। कई की तो वाणी भी गुरु जैसी ही हो जाती है। वाणी, विचार, वृत्ति, वेशभूषा, सब में जब सद्गुरु अवतरित होते हैं तब यह नहीं पूछना पड़ता कि तुम्हारा गुरु कौन है? तब तो यह शिष्य को देखते ही पता चल जाता है। जब परमात्मा अवतरित होते हैं, तो पहले सुयोग्य माता-पिता की खोज करते हैं, उसी प्रकार सद्गुरू भी अवतरित होने के लिए होनहार शिष्य ढूँढ़ते हैं। गुरू अपने शिष्य से माँ से भी ज्यादा परंपरा के माध्यम से यह अविनाशी गुरुतत्व हमेशा शिष्य को प्रकाश देता रहता है। ‘‘शिष्य गुरु की आराधना और उपासना करते -करते गुरुमय हो जाता है।’’ का आशय है-
  • A. शिष्य के व्यक्तित्व में गुरू का प्रतिबिंब दिखाई देता है।
  • B. शिष्य के व्यक्तित्व पर गुरु का थोड़ा-थोड़ा प्रभाव दिखने लगता है।
  • C. शिष्य गुरू की शिक्षाओं को आत्मसात करके उसी राह पर चलता है।
  • D. शिष्य स्वयं गुरु बन जाता है।
Correct Answer: Option C - शिष्य गुरू की आराधना और उपासना करते - करते गुरूमय हो जाता है। जबकि शिष्य गुरू की शिक्षाओं को आत्मसात करके उसी राह पर चलता है।
C. शिष्य गुरू की आराधना और उपासना करते - करते गुरूमय हो जाता है। जबकि शिष्य गुरू की शिक्षाओं को आत्मसात करके उसी राह पर चलता है।

Explanations:

शिष्य गुरू की आराधना और उपासना करते - करते गुरूमय हो जाता है। जबकि शिष्य गुरू की शिक्षाओं को आत्मसात करके उसी राह पर चलता है।