Correct Answer:
Option D - 18वीं सदी तक भारतीय महीन कपड़ों का दबदबा अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बना हुआ था। 1772 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी हेनरी पतूलों के अनुसार भारतीय कपड़े की माँग कभी कम नहीं हो सकती क्योंकि दुनिया के किसी और देश में इतना अच्छा माल नहीं बनता। 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत के कपड़ा निर्यात में गिरावट आने लगी जो लंबे समय तक जारी रही क्योंकि औद्योगिकरण के दौर में इंग्लैण्ड में कपड़ा बुनने एवं कातने वाली मशीनों जैसे फ्लाइंग शटल, स्पिनिंग जेनी आदि का विकास हुआ। फ्लाइंग शटल के आने से हथकरघा कामगारों की उत्पादकता में सुधार हुआ। मशीनों के आने के कारण भारतीय कपड़ा बुनकरों का पतन होने लगा जिससे भारतीय कपड़ों के निर्यात में कमी आने लगी। इसके अतिरिक्त अमेरिकी गृहयुद्ध के पश्चात भारतीय कपास के निर्यात में वृद्धि आ गयी क्योंकि ब्रिटेन को अमेरिका से कपास प्राप्त होना सम्भव नहीं था। अत: ब्रिटेन भारत से कपास मगाँने लगा।
D. 18वीं सदी तक भारतीय महीन कपड़ों का दबदबा अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बना हुआ था। 1772 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी हेनरी पतूलों के अनुसार भारतीय कपड़े की माँग कभी कम नहीं हो सकती क्योंकि दुनिया के किसी और देश में इतना अच्छा माल नहीं बनता। 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत के कपड़ा निर्यात में गिरावट आने लगी जो लंबे समय तक जारी रही क्योंकि औद्योगिकरण के दौर में इंग्लैण्ड में कपड़ा बुनने एवं कातने वाली मशीनों जैसे फ्लाइंग शटल, स्पिनिंग जेनी आदि का विकास हुआ। फ्लाइंग शटल के आने से हथकरघा कामगारों की उत्पादकता में सुधार हुआ। मशीनों के आने के कारण भारतीय कपड़ा बुनकरों का पतन होने लगा जिससे भारतीय कपड़ों के निर्यात में कमी आने लगी। इसके अतिरिक्त अमेरिकी गृहयुद्ध के पश्चात भारतीय कपास के निर्यात में वृद्धि आ गयी क्योंकि ब्रिटेन को अमेरिका से कपास प्राप्त होना सम्भव नहीं था। अत: ब्रिटेन भारत से कपास मगाँने लगा।