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Q: ‘न धर्मवृद्धेषु वय: समीक्ष्यते’ यह सूक्ति किस कवि की है?
  • A. कालिदास
  • B. भारवि
  • C. माघ
  • D. श्रीहर्ष
Correct Answer: Option A - ‘‘न धर्मवृद्धेषु वय: समीक्ष्यते’’ यह सूक्ति महाकवि कालिदास की है। यह सूक्ति उनके ग्रंथ ‘कुमार संभवम्’ से अवतरित है, जिसका अर्थ है कि- कम उम्र वाले व्यक्ति भी तप (आचरण) के कारण आदरणीय होते हैं। कालिदास तीसरी-चौथी शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार थे। अभिज्ञान शाकुंतलम्, ऋतुसंहार, विक्रमोर्वशीयम् इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।
A. ‘‘न धर्मवृद्धेषु वय: समीक्ष्यते’’ यह सूक्ति महाकवि कालिदास की है। यह सूक्ति उनके ग्रंथ ‘कुमार संभवम्’ से अवतरित है, जिसका अर्थ है कि- कम उम्र वाले व्यक्ति भी तप (आचरण) के कारण आदरणीय होते हैं। कालिदास तीसरी-चौथी शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार थे। अभिज्ञान शाकुंतलम्, ऋतुसंहार, विक्रमोर्वशीयम् इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।

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‘‘न धर्मवृद्धेषु वय: समीक्ष्यते’’ यह सूक्ति महाकवि कालिदास की है। यह सूक्ति उनके ग्रंथ ‘कुमार संभवम्’ से अवतरित है, जिसका अर्थ है कि- कम उम्र वाले व्यक्ति भी तप (आचरण) के कारण आदरणीय होते हैं। कालिदास तीसरी-चौथी शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार थे। अभिज्ञान शाकुंतलम्, ऋतुसंहार, विक्रमोर्वशीयम् इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।