Correct Answer:
Option B - ‘न खलु धीमतां कश्चिदविषयो नाम’ शाङ्र्गरवस्य उक्ति:। यह कथन महाकविकालिदास कृत अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थ अंक का है। वत्से, त्वमिदानीमनुशासनीयाऽसि वनौकसोऽपि सन्तो लौकिकज्ञा वयम्। ‘न खलु धीमतां कश्चिदविषयो नाम’ अर्थात् ‘वनवासी होते हुए भी हम लोग लौकिक व्यवहारों को जानते हैं’ काश्यप के ऐसे वचनों को सुनकर शाङ्र्गरव कहते हैं- विद्वानों के लिए वस्तुत: कोई चीज अज्ञात नहीं होती है।
B. ‘न खलु धीमतां कश्चिदविषयो नाम’ शाङ्र्गरवस्य उक्ति:। यह कथन महाकविकालिदास कृत अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थ अंक का है। वत्से, त्वमिदानीमनुशासनीयाऽसि वनौकसोऽपि सन्तो लौकिकज्ञा वयम्। ‘न खलु धीमतां कश्चिदविषयो नाम’ अर्थात् ‘वनवासी होते हुए भी हम लोग लौकिक व्यवहारों को जानते हैं’ काश्यप के ऐसे वचनों को सुनकर शाङ्र्गरव कहते हैं- विद्वानों के लिए वस्तुत: कोई चीज अज्ञात नहीं होती है।