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Q: ``न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाय प्राप्ते मित्रे भवति विमुख: किं पुनर्यस्तथोच्चै:।'' उपर्युक्त सूक्ति किस ग्रन्थ से उद्धृत है?
  • A. मेघदूतम्
  • B. अभिज्ञानशाकुन्तलम्
  • C. उत्तररामचरितम्
  • D. नीतिशतकम्
Correct Answer: Option A - ``न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाय प्राप्ते मित्रे भवति विमुख: किं पुनर्यस्तथोच्चै:।'' उपर्युक्त सूक्ति मेघदूतम् ग्रन्थ से उद्धृत है। इसका तात्पर्य है─छोटा जन भी आश्रय चाहने वाले मित्र के आने पर उसके पहले किये हुए उपकार का ध्यान रखकर आश्रय देने से मुख नहीं मोड़ता।
A. ``न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाय प्राप्ते मित्रे भवति विमुख: किं पुनर्यस्तथोच्चै:।'' उपर्युक्त सूक्ति मेघदूतम् ग्रन्थ से उद्धृत है। इसका तात्पर्य है─छोटा जन भी आश्रय चाहने वाले मित्र के आने पर उसके पहले किये हुए उपकार का ध्यान रखकर आश्रय देने से मुख नहीं मोड़ता।

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``न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाय प्राप्ते मित्रे भवति विमुख: किं पुनर्यस्तथोच्चै:।'' उपर्युक्त सूक्ति मेघदूतम् ग्रन्थ से उद्धृत है। इसका तात्पर्य है─छोटा जन भी आश्रय चाहने वाले मित्र के आने पर उसके पहले किये हुए उपकार का ध्यान रखकर आश्रय देने से मुख नहीं मोड़ता।