Correct Answer:
Option C - अलंकार सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य भामह का अभिमत है कि न कान्तमपि निर्भूषं विभाति वनितामुखम्' अर्थात् अलंकार विहीन कविता उसी प्रकार शोभायमान नहीं होती, जिस प्रकार किसी कामिनी का मुख आभूषणों के बिना शोभित नहीं होता। अन्य अलंकारवादी आचार्य दण्डी के अनुसार `काव्य शोभा करान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते' (काव्य के शोभाकारक धर्म अलंकार कहलाते हैं) हिन्दी कवि आचार्य केशवदास ने भी लिखा है - ``भूषण बिन न विराजई कविता वनिता मित्त''
C. अलंकार सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य भामह का अभिमत है कि न कान्तमपि निर्भूषं विभाति वनितामुखम्' अर्थात् अलंकार विहीन कविता उसी प्रकार शोभायमान नहीं होती, जिस प्रकार किसी कामिनी का मुख आभूषणों के बिना शोभित नहीं होता। अन्य अलंकारवादी आचार्य दण्डी के अनुसार `काव्य शोभा करान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते' (काव्य के शोभाकारक धर्म अलंकार कहलाते हैं) हिन्दी कवि आचार्य केशवदास ने भी लिखा है - ``भूषण बिन न विराजई कविता वनिता मित्त''