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Q: ‘मुख्यार्थबाधे तद्योगे रूढि़तोऽथ प्रयोजनात् । अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत् सा लक्षणारोपिता क्रिया।।’ इस कथन के आचार्य हैं–
  • A. कुन्तक
  • B. आनन्दवर्धन
  • C. विश्वनाथ
  • D. मम्मट
Correct Answer: Option D - ‘मुख्यार्थबाधे तद्योगे रूढितोऽथ प्रयोजनात् । अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत् सा लक्षणारोपिता क्रिया।।’’ यह कथन आचार्य मम्मट का है। – मुख्यार्थ को बाधित करके अमुख्यार्थ को महत्त्व देने की क्रिया या तो लोक प्रचलित व्यवहार पर आधृत होती है अथवा प्रभावोत्पादन के प्रयोजन से प्रेरित होती है। शब्द की वह शक्ति जिसमें रूढि़ अथवा प्रयोजनवश शब्द का मुख्यार्थ बाधित होता है किन्तु उसी से सम्बद्ध अन्य अर्थ प्रकाशित होता है, लक्षणा कहलाती है। – कुन्तक अभिधावादी आचार्य थे। इनकी एकमात्र रचना ‘वक्रोक्ति जीवित’ अधूरी ही उपलब्ध है। – आनन्दवर्द्धन ‘ध्वनि संप्रदाय’ के प्रवर्तक आचार्य थे। इनकी कृति ‘ध्वन्यालोक’ प्रसिद्ध है।
D. ‘मुख्यार्थबाधे तद्योगे रूढितोऽथ प्रयोजनात् । अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत् सा लक्षणारोपिता क्रिया।।’’ यह कथन आचार्य मम्मट का है। – मुख्यार्थ को बाधित करके अमुख्यार्थ को महत्त्व देने की क्रिया या तो लोक प्रचलित व्यवहार पर आधृत होती है अथवा प्रभावोत्पादन के प्रयोजन से प्रेरित होती है। शब्द की वह शक्ति जिसमें रूढि़ अथवा प्रयोजनवश शब्द का मुख्यार्थ बाधित होता है किन्तु उसी से सम्बद्ध अन्य अर्थ प्रकाशित होता है, लक्षणा कहलाती है। – कुन्तक अभिधावादी आचार्य थे। इनकी एकमात्र रचना ‘वक्रोक्ति जीवित’ अधूरी ही उपलब्ध है। – आनन्दवर्द्धन ‘ध्वनि संप्रदाय’ के प्रवर्तक आचार्य थे। इनकी कृति ‘ध्वन्यालोक’ प्रसिद्ध है।

Explanations:

‘मुख्यार्थबाधे तद्योगे रूढितोऽथ प्रयोजनात् । अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत् सा लक्षणारोपिता क्रिया।।’’ यह कथन आचार्य मम्मट का है। – मुख्यार्थ को बाधित करके अमुख्यार्थ को महत्त्व देने की क्रिया या तो लोक प्रचलित व्यवहार पर आधृत होती है अथवा प्रभावोत्पादन के प्रयोजन से प्रेरित होती है। शब्द की वह शक्ति जिसमें रूढि़ अथवा प्रयोजनवश शब्द का मुख्यार्थ बाधित होता है किन्तु उसी से सम्बद्ध अन्य अर्थ प्रकाशित होता है, लक्षणा कहलाती है। – कुन्तक अभिधावादी आचार्य थे। इनकी एकमात्र रचना ‘वक्रोक्ति जीवित’ अधूरी ही उपलब्ध है। – आनन्दवर्द्धन ‘ध्वनि संप्रदाय’ के प्रवर्तक आचार्य थे। इनकी कृति ‘ध्वन्यालोक’ प्रसिद्ध है।