Correct Answer:
Option D - काव्यस्य षड्विधं प्रयोजनं काव्यप्रकाशे काव्यग्रन्थे उक्तम्। आचार्य मम्मट द्वारा विरचित काव्यप्रकाश काव्य ग्रन्थ में छ: (प्रकार के) प्रयोजन कहे गये हैं– (1) यश की प्राप्ति (2) अर्थ-उत्पादक (3) व्यवहार बोधक (4) अनिष्ट नाशक (5) परमानन्द प्रदाता और (6) स्त्री के समान उपदेष्टा।
काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्य: परनिर्वृत्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे।।
इसमें उपदेश शैली सबसे विलक्षण होती है जो तीन प्रकार की हैं-
(1) शब्द प्रधान (प्रभुसम्मितवेदादि शास्त्रेभ्य:), (2) अर्थप्रधान (सुहृत्सम्मितपुराणादीतिहासेभ्य:) (3) रस प्रधान (शब्दार्थयोर्गुण भावेन) होती है। लेकिन परमानन्द सभी प्रयोजनों में मौलिक प्रयोजन है।
‘काव्यालंकार’ भामह का काव्यग्रन्थ, ‘साहित्यदर्पण’ विश्वनाथ की रचना है–जिसमें दस परिच्छेद हैं, और ‘वक्रोक्तिजीवित’ कुन्तक की रचना है इसमें चार उन्मेष हैं।
D. काव्यस्य षड्विधं प्रयोजनं काव्यप्रकाशे काव्यग्रन्थे उक्तम्। आचार्य मम्मट द्वारा विरचित काव्यप्रकाश काव्य ग्रन्थ में छ: (प्रकार के) प्रयोजन कहे गये हैं– (1) यश की प्राप्ति (2) अर्थ-उत्पादक (3) व्यवहार बोधक (4) अनिष्ट नाशक (5) परमानन्द प्रदाता और (6) स्त्री के समान उपदेष्टा।
काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्य: परनिर्वृत्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे।।
इसमें उपदेश शैली सबसे विलक्षण होती है जो तीन प्रकार की हैं-
(1) शब्द प्रधान (प्रभुसम्मितवेदादि शास्त्रेभ्य:), (2) अर्थप्रधान (सुहृत्सम्मितपुराणादीतिहासेभ्य:) (3) रस प्रधान (शब्दार्थयोर्गुण भावेन) होती है। लेकिन परमानन्द सभी प्रयोजनों में मौलिक प्रयोजन है।
‘काव्यालंकार’ भामह का काव्यग्रन्थ, ‘साहित्यदर्पण’ विश्वनाथ की रचना है–जिसमें दस परिच्छेद हैं, और ‘वक्रोक्तिजीवित’ कुन्तक की रचना है इसमें चार उन्मेष हैं।