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Q: क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् - अत्र स्थायीभूषणं किम् ?
  • A. स्वर्णाभूषणम्
  • B. वाणीरूपभूषणम्
  • C. धनरूपभूषणम्
  • D. भौतिकसंसाधनम्
Correct Answer: Option B - क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् - अत्र स्थायीभूषणं वाणीरूपभूषणम्। यह सूक्ति भर्तृहरि कृत नीतिशतकम् की है। ‘केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला: न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजा:। वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते। क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्।।’ अर्थात् न बाजूबन्द से, न चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार से, न स्नान से, न सुगन्धित पदार्थों के विलेपन से, न फूलों से, न अलंकृत केशों से, पुरुषों की शोभा तो वाणी रूपी आभूषण से है। आभूषणों की चमक तो मन्द पड़ जाती है परन्तु सन्तुलित वाणी की गरिमा (चमक) सतत् रहती है।
B. क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् - अत्र स्थायीभूषणं वाणीरूपभूषणम्। यह सूक्ति भर्तृहरि कृत नीतिशतकम् की है। ‘केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला: न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजा:। वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते। क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्।।’ अर्थात् न बाजूबन्द से, न चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार से, न स्नान से, न सुगन्धित पदार्थों के विलेपन से, न फूलों से, न अलंकृत केशों से, पुरुषों की शोभा तो वाणी रूपी आभूषण से है। आभूषणों की चमक तो मन्द पड़ जाती है परन्तु सन्तुलित वाणी की गरिमा (चमक) सतत् रहती है।

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क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् - अत्र स्थायीभूषणं वाणीरूपभूषणम्। यह सूक्ति भर्तृहरि कृत नीतिशतकम् की है। ‘केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला: न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजा:। वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते। क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्।।’ अर्थात् न बाजूबन्द से, न चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार से, न स्नान से, न सुगन्धित पदार्थों के विलेपन से, न फूलों से, न अलंकृत केशों से, पुरुषों की शोभा तो वाणी रूपी आभूषण से है। आभूषणों की चमक तो मन्द पड़ जाती है परन्तु सन्तुलित वाणी की गरिमा (चमक) सतत् रहती है।