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Q: किस रस को रस राज कहा जाता है?
  • A. शृंगार रस
  • B. वीर रस
  • C. शांत रस
  • D. करुण रस
Correct Answer: Option A - `शृंगार रस' को रसराज कहा जाता है। शृंगार रस के दो भेद हैं। (1) संयोग शृंगार, (2) वियोग शृंगार। संयोग शृंगार- जहाँ नायक और नायिका के मिलन का वर्णन हो वहाँ संयोग शृंगार रस होता है; जैसे– ‘‘बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।’’ वियोग शृंगार– जहाँ नायक और नायिका के विरह (दूर) का वर्णन हो वहाँ वियोग शृंगार रस होता है; जैसे– ‘‘हे! खग-मृग हे! मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृग नैनी।’’
A. `शृंगार रस' को रसराज कहा जाता है। शृंगार रस के दो भेद हैं। (1) संयोग शृंगार, (2) वियोग शृंगार। संयोग शृंगार- जहाँ नायक और नायिका के मिलन का वर्णन हो वहाँ संयोग शृंगार रस होता है; जैसे– ‘‘बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।’’ वियोग शृंगार– जहाँ नायक और नायिका के विरह (दूर) का वर्णन हो वहाँ वियोग शृंगार रस होता है; जैसे– ‘‘हे! खग-मृग हे! मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृग नैनी।’’

Explanations:

`शृंगार रस' को रसराज कहा जाता है। शृंगार रस के दो भेद हैं। (1) संयोग शृंगार, (2) वियोग शृंगार। संयोग शृंगार- जहाँ नायक और नायिका के मिलन का वर्णन हो वहाँ संयोग शृंगार रस होता है; जैसे– ‘‘बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।’’ वियोग शृंगार– जहाँ नायक और नायिका के विरह (दूर) का वर्णन हो वहाँ वियोग शृंगार रस होता है; जैसे– ‘‘हे! खग-मृग हे! मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृग नैनी।’’