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Q: किरातार्जुनीये महाकाव्ये कियन्त: सर्गा:?
  • A. 21
  • B. 19
  • C. 18
  • D. 22
Correct Answer: Option C - : किरातार्जुनीये महाकाव्ये अष्टादश (18) सर्गा: सन्ति। किरातार्जुनीयम् महाकाव्य में 18 सर्ग हैं। यह भारवि की एक मात्र रचना है। इसका प्रधानरस ‘वीर रस’ है। इसका उपजीव्य काव्य महाभारत का ‘वन पर्व’ है। इस महाकाव्य की रीति पाञ्चाली तथा गुण ‘ओज’ है। यह महाकाव्य बृहत्त्रयी में प्रथम स्थान पर परिगणित होता है। भारवि के किरातार्जुनीयम् का प्रारम्भ ‘श्री’ शब्द से तथा प्रत्येक सर्ग के अन्तिम श्लोक में ‘लक्ष्मी’ पद का प्रयोग हुआ है।
C. : किरातार्जुनीये महाकाव्ये अष्टादश (18) सर्गा: सन्ति। किरातार्जुनीयम् महाकाव्य में 18 सर्ग हैं। यह भारवि की एक मात्र रचना है। इसका प्रधानरस ‘वीर रस’ है। इसका उपजीव्य काव्य महाभारत का ‘वन पर्व’ है। इस महाकाव्य की रीति पाञ्चाली तथा गुण ‘ओज’ है। यह महाकाव्य बृहत्त्रयी में प्रथम स्थान पर परिगणित होता है। भारवि के किरातार्जुनीयम् का प्रारम्भ ‘श्री’ शब्द से तथा प्रत्येक सर्ग के अन्तिम श्लोक में ‘लक्ष्मी’ पद का प्रयोग हुआ है।

Explanations:

: किरातार्जुनीये महाकाव्ये अष्टादश (18) सर्गा: सन्ति। किरातार्जुनीयम् महाकाव्य में 18 सर्ग हैं। यह भारवि की एक मात्र रचना है। इसका प्रधानरस ‘वीर रस’ है। इसका उपजीव्य काव्य महाभारत का ‘वन पर्व’ है। इस महाकाव्य की रीति पाञ्चाली तथा गुण ‘ओज’ है। यह महाकाव्य बृहत्त्रयी में प्रथम स्थान पर परिगणित होता है। भारवि के किरातार्जुनीयम् का प्रारम्भ ‘श्री’ शब्द से तथा प्रत्येक सर्ग के अन्तिम श्लोक में ‘लक्ष्मी’ पद का प्रयोग हुआ है।