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Q: किरातार्जुनीये कस्य रसस्य प्रधानता?
  • A. शृंगाररसस्य
  • B. हास्यरसस्य
  • C. वीररसस्य
  • D. अद्भुतरसस्य
Correct Answer: Option C - किरातार्जुनीये वीर रसस्य प्रधानता। किरातार्जुनीयम् महाकवि भारवि की एक मात्र रचना है जो अट्ठारह सर्गों में विभक्त है। इसका उपजीव्यग्रन्थ महाभारत का वनपर्व है। इसका नायक अर्जुन तथा नायिका द्रौपदी है। इसका मुख्य रस ‘वीर रस’ है। यह बृृहत्त्रयी में प्रथम स्थान पर परिगणित महाकाव्य है। इस महाकाव्य का प्रारम्भ ‘श्री’ शब्द से होता है और अन्त ‘लक्ष्मी’ पद से होता है।
C. किरातार्जुनीये वीर रसस्य प्रधानता। किरातार्जुनीयम् महाकवि भारवि की एक मात्र रचना है जो अट्ठारह सर्गों में विभक्त है। इसका उपजीव्यग्रन्थ महाभारत का वनपर्व है। इसका नायक अर्जुन तथा नायिका द्रौपदी है। इसका मुख्य रस ‘वीर रस’ है। यह बृृहत्त्रयी में प्रथम स्थान पर परिगणित महाकाव्य है। इस महाकाव्य का प्रारम्भ ‘श्री’ शब्द से होता है और अन्त ‘लक्ष्मी’ पद से होता है।

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किरातार्जुनीये वीर रसस्य प्रधानता। किरातार्जुनीयम् महाकवि भारवि की एक मात्र रचना है जो अट्ठारह सर्गों में विभक्त है। इसका उपजीव्यग्रन्थ महाभारत का वनपर्व है। इसका नायक अर्जुन तथा नायिका द्रौपदी है। इसका मुख्य रस ‘वीर रस’ है। यह बृृहत्त्रयी में प्रथम स्थान पर परिगणित महाकाव्य है। इस महाकाव्य का प्रारम्भ ‘श्री’ शब्द से होता है और अन्त ‘लक्ष्मी’ पद से होता है।