Correct Answer:
Option B - ‘किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्’ इतीयं सूक्ति: ‘अभिज्ञानशाकुन्तले’ वर्तते। अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के प्रथम अङ्क में शकुन्तला को देखकर राजा दुष्यन्त कहता है कि- सुन्दर और मनोहारी आकृतिवालों के लिए सभी वस्तुएं शोभा दायक होती हैं।
उत्तररामचरित- भवभूति की नाट्य रचना है। उत्तररामचरित में 7 अंक है इसमें करुण रस की प्रधानता है।
मेघदूत- यह कालिदास जी का गीतिकाव्य/खण्डकाव्य है। मेघदूत दो भागों में विभक्त है पूर्व मेघ एवं उत्तर मेघ
नीतिशतक- यह भतृहरि का नीतिपरक ग्रन्थ है। नीतिशतक छन्दों में निबद्ध होने के कारण गेय ग्रन्थ है।
B. ‘किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्’ इतीयं सूक्ति: ‘अभिज्ञानशाकुन्तले’ वर्तते। अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के प्रथम अङ्क में शकुन्तला को देखकर राजा दुष्यन्त कहता है कि- सुन्दर और मनोहारी आकृतिवालों के लिए सभी वस्तुएं शोभा दायक होती हैं।
उत्तररामचरित- भवभूति की नाट्य रचना है। उत्तररामचरित में 7 अंक है इसमें करुण रस की प्रधानता है।
मेघदूत- यह कालिदास जी का गीतिकाव्य/खण्डकाव्य है। मेघदूत दो भागों में विभक्त है पूर्व मेघ एवं उत्तर मेघ
नीतिशतक- यह भतृहरि का नीतिपरक ग्रन्थ है। नीतिशतक छन्दों में निबद्ध होने के कारण गेय ग्रन्थ है।