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Q: ‘‘जन्म सिन्धु पुनि बंधु, दिन मलीन सकलंक। सिय मुख समता पाव किमि चंद बापुरो रंक।।’’ इस उद्धरण में अलंकार है:
  • A. असंगति
  • B. व्यतिरेक
  • C. अनन्वय
  • D. प्रतीप
Correct Answer: Option B - ‘‘जन्म सिन्धु पुनि बंधु, दिन मलीन सकलंक। सिय मुख समता पाव किमि चंद बापुरो रंक।।’’ इस उद्धरण में व्यतिरेक अलंकार है। व्यतिरेक अलंकार– जब किसी पद में उपमान की अपेक्षा उपमेय को अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाए तो वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है; जैसे– जन्म सिंधु ........... बापुरो रंक।। पद में उपमान (चन्द्र) की अपेक्षा उपमेय (सिय मुख) की शोभा का उत्कर्ष पूर्ण वर्णन किया गया है। अत: यहाँ व्यतिरेक अलंकार है।
B. ‘‘जन्म सिन्धु पुनि बंधु, दिन मलीन सकलंक। सिय मुख समता पाव किमि चंद बापुरो रंक।।’’ इस उद्धरण में व्यतिरेक अलंकार है। व्यतिरेक अलंकार– जब किसी पद में उपमान की अपेक्षा उपमेय को अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाए तो वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है; जैसे– जन्म सिंधु ........... बापुरो रंक।। पद में उपमान (चन्द्र) की अपेक्षा उपमेय (सिय मुख) की शोभा का उत्कर्ष पूर्ण वर्णन किया गया है। अत: यहाँ व्यतिरेक अलंकार है।

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‘‘जन्म सिन्धु पुनि बंधु, दिन मलीन सकलंक। सिय मुख समता पाव किमि चंद बापुरो रंक।।’’ इस उद्धरण में व्यतिरेक अलंकार है। व्यतिरेक अलंकार– जब किसी पद में उपमान की अपेक्षा उपमेय को अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाए तो वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है; जैसे– जन्म सिंधु ........... बापुरो रंक।। पद में उपमान (चन्द्र) की अपेक्षा उपमेय (सिय मुख) की शोभा का उत्कर्ष पूर्ण वर्णन किया गया है। अत: यहाँ व्यतिरेक अलंकार है।