Correct Answer:
Option A - 1809 में लैमार्क की पुस्तक `फिलॉसफी जूलोजिक' में उसके सिद्धान्त का प्रकाशन किया गया, जिसे लैमार्कवाद की संज्ञा दी गयी। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवों एवं इनके अंगों में सतत बड़े होते रहने की प्राकृतिक प्रवृत्ति पायी जाती है। इन जीवों पर वातावरणीय परिवर्तन का सीधा प्रभाव पड़ता है। अधिक उपयोग में आने वाले अंगों का विकास अधिक जैसे जिराफ की गर्दन तथा कम उपयोग में आने वाले अंगों का विकास कम होता है जैसे साँप की पूँछ।
A. 1809 में लैमार्क की पुस्तक `फिलॉसफी जूलोजिक' में उसके सिद्धान्त का प्रकाशन किया गया, जिसे लैमार्कवाद की संज्ञा दी गयी। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवों एवं इनके अंगों में सतत बड़े होते रहने की प्राकृतिक प्रवृत्ति पायी जाती है। इन जीवों पर वातावरणीय परिवर्तन का सीधा प्रभाव पड़ता है। अधिक उपयोग में आने वाले अंगों का विकास अधिक जैसे जिराफ की गर्दन तथा कम उपयोग में आने वाले अंगों का विकास कम होता है जैसे साँप की पूँछ।