Correct Answer:
Option A - ऋग्वेद में ‘धान्यकृत’ शब्द का प्रयोग ओसाने वाले के लिए हुआ है। ऋग्वेद में पशुचारण की तुलना में कृषि का स्थान गौड़ था। ऋग्वेद के कुल 10462 श्लोकों में से केवल 24 में ही कृषि का उल्लेख है। कृषि में महत्व के तीन शब्द संहिता के मूल भाग में प्राप्त हैं – उर्दर, धान्य एवं बपन्ति।
चर्षिणी शब्द का प्रयोग कृषि या कृष्टि हेतु किया गया है। जुते हुए खेत को ‘‘क्षेत्र’’ एवं ‘‘उपजाऊ’’ भूमि को ‘‘उर्वरा’’ कहते थे। भूमि खेतों में विभक्त थी जिनके बीच में जमीनों की पट्टियाँ ‘‘खिल्य’’ होती थी। ‘‘खिल्य’’ शब्द का प्रयोग परती या ऊसर आदि भूमियों के लिए भी किया गया है।
A. ऋग्वेद में ‘धान्यकृत’ शब्द का प्रयोग ओसाने वाले के लिए हुआ है। ऋग्वेद में पशुचारण की तुलना में कृषि का स्थान गौड़ था। ऋग्वेद के कुल 10462 श्लोकों में से केवल 24 में ही कृषि का उल्लेख है। कृषि में महत्व के तीन शब्द संहिता के मूल भाग में प्राप्त हैं – उर्दर, धान्य एवं बपन्ति।
चर्षिणी शब्द का प्रयोग कृषि या कृष्टि हेतु किया गया है। जुते हुए खेत को ‘‘क्षेत्र’’ एवं ‘‘उपजाऊ’’ भूमि को ‘‘उर्वरा’’ कहते थे। भूमि खेतों में विभक्त थी जिनके बीच में जमीनों की पट्टियाँ ‘‘खिल्य’’ होती थी। ‘‘खिल्य’’ शब्द का प्रयोग परती या ऊसर आदि भूमियों के लिए भी किया गया है।