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Q: मैया मोरि मैं नहीं माखन खायो’’ पंक्ति में ‘म’ व्यंजन की आवृत्ति हुई है। वर्ण की आवृत्ति किस अलंकार में होती है?
  • A. श्लेष
  • B. यमक
  • C. अनुप्रास
  • D. अतिशयोक्ति
Correct Answer: Option C - ‘‘मैया मोरि मैं नहीं माखन खायो।’’ पंक्ति में ‘म’ व्यंजन की आवृत्ति हुई है। वर्ण की आवृत्ति ‘अनुप्रास अलंकार’ में होती है। श्लेष अलंकार– जब एक पंक्ति में एक ही शब्द के अनेक अर्थ होते हैं, तब वहाँ श्लेष अलंकार होता है, जैसे– चरन धरत चिंता करत, चितवत चारहुँ ओर। सुबरन को ढूढँत फिरत, कवि, व्यभिचारी चोर।। यमक अलंकार– जहाँ एक शब्द की आवृत्ति दो या दो से अधिक बार होती है, परन्तु उनके अर्थ अलग–अलग होते हैं, वहाँ यमक अलंकार होता है। जैसे– तीन बेर खाती थी, वो तीन बेर खाती है। अतिशयोक्ति अलंकार– जहाँ किसी व्यक्ति या वस्तु का बढ़ा चढ़ा कर वर्णन या प्रशंसा किया जाय, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है। जैसे– लेवत मुख में घास मृग, मोर तजत नृत जात आँसू गिरियत जर लता, पीरे–पीरे पात।
C. ‘‘मैया मोरि मैं नहीं माखन खायो।’’ पंक्ति में ‘म’ व्यंजन की आवृत्ति हुई है। वर्ण की आवृत्ति ‘अनुप्रास अलंकार’ में होती है। श्लेष अलंकार– जब एक पंक्ति में एक ही शब्द के अनेक अर्थ होते हैं, तब वहाँ श्लेष अलंकार होता है, जैसे– चरन धरत चिंता करत, चितवत चारहुँ ओर। सुबरन को ढूढँत फिरत, कवि, व्यभिचारी चोर।। यमक अलंकार– जहाँ एक शब्द की आवृत्ति दो या दो से अधिक बार होती है, परन्तु उनके अर्थ अलग–अलग होते हैं, वहाँ यमक अलंकार होता है। जैसे– तीन बेर खाती थी, वो तीन बेर खाती है। अतिशयोक्ति अलंकार– जहाँ किसी व्यक्ति या वस्तु का बढ़ा चढ़ा कर वर्णन या प्रशंसा किया जाय, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है। जैसे– लेवत मुख में घास मृग, मोर तजत नृत जात आँसू गिरियत जर लता, पीरे–पीरे पात।

Explanations:

‘‘मैया मोरि मैं नहीं माखन खायो।’’ पंक्ति में ‘म’ व्यंजन की आवृत्ति हुई है। वर्ण की आवृत्ति ‘अनुप्रास अलंकार’ में होती है। श्लेष अलंकार– जब एक पंक्ति में एक ही शब्द के अनेक अर्थ होते हैं, तब वहाँ श्लेष अलंकार होता है, जैसे– चरन धरत चिंता करत, चितवत चारहुँ ओर। सुबरन को ढूढँत फिरत, कवि, व्यभिचारी चोर।। यमक अलंकार– जहाँ एक शब्द की आवृत्ति दो या दो से अधिक बार होती है, परन्तु उनके अर्थ अलग–अलग होते हैं, वहाँ यमक अलंकार होता है। जैसे– तीन बेर खाती थी, वो तीन बेर खाती है। अतिशयोक्ति अलंकार– जहाँ किसी व्यक्ति या वस्तु का बढ़ा चढ़ा कर वर्णन या प्रशंसा किया जाय, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है। जैसे– लेवत मुख में घास मृग, मोर तजत नृत जात आँसू गिरियत जर लता, पीरे–पीरे पात।