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Q: ‘‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वच:।’’ इति केन उक्तम्?
  • A. भर्तृहरिणा।
  • B. भारविना।
  • C. बाणभट्टेन।
  • D. भासेन।
Correct Answer: Option B - ‘‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वच:।’’ इति भारविना उक्तम्। किरातार्जुनीयम् महाकाव्य महाकवि भारवि की प्रसिद्ध रचना है यह 18 सर्गों में विभक्त है तथा इसी महाकाव्य के प्रथम सर्ग में युधिष्ठिर-वनेचर वार्तालाप में वनेचर द्वारा कहा गया है। वनेचर महाराज युधिष्ठिर से कहता है कि हे महाराज! ‘‘हितकर और मनोहर वाणी दुर्लभ है।’’
B. ‘‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वच:।’’ इति भारविना उक्तम्। किरातार्जुनीयम् महाकाव्य महाकवि भारवि की प्रसिद्ध रचना है यह 18 सर्गों में विभक्त है तथा इसी महाकाव्य के प्रथम सर्ग में युधिष्ठिर-वनेचर वार्तालाप में वनेचर द्वारा कहा गया है। वनेचर महाराज युधिष्ठिर से कहता है कि हे महाराज! ‘‘हितकर और मनोहर वाणी दुर्लभ है।’’

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‘‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वच:।’’ इति भारविना उक्तम्। किरातार्जुनीयम् महाकाव्य महाकवि भारवि की प्रसिद्ध रचना है यह 18 सर्गों में विभक्त है तथा इसी महाकाव्य के प्रथम सर्ग में युधिष्ठिर-वनेचर वार्तालाप में वनेचर द्वारा कहा गया है। वनेचर महाराज युधिष्ठिर से कहता है कि हे महाराज! ‘‘हितकर और मनोहर वाणी दुर्लभ है।’’