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Q: गीता का स्वधर्म सिद्धान्त है –
  • A. वर्णव्यवस्था का सिद्धान्त
  • B. कर्म सिद्धान्त
  • C. आत्म सिद्धान्त
  • D. इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: Option A - गीता का स्वधर्म सिद्धान्त वर्ण व्यवस्था का सिद्धान्त है। गीता का स्वधर्म वर्ण धर्म है। गीता अध्याय 4 श्लोक 13 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।। हे अर्जुन! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। (इस प्रकार) उस (सृष्टिरचनादि-कर्म) का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को (तू वास्तव में) अकर्ता ही जान। इस प्रकार गीता चार वर्णों की सामाजिक व्यवस्था की समर्थक है और प्रत्येक व्यक्ति से अपने व्यक्तिगत कर्म को सम्पादित करने का आग्रह करती है।
A. गीता का स्वधर्म सिद्धान्त वर्ण व्यवस्था का सिद्धान्त है। गीता का स्वधर्म वर्ण धर्म है। गीता अध्याय 4 श्लोक 13 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।। हे अर्जुन! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। (इस प्रकार) उस (सृष्टिरचनादि-कर्म) का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को (तू वास्तव में) अकर्ता ही जान। इस प्रकार गीता चार वर्णों की सामाजिक व्यवस्था की समर्थक है और प्रत्येक व्यक्ति से अपने व्यक्तिगत कर्म को सम्पादित करने का आग्रह करती है।

Explanations:

गीता का स्वधर्म सिद्धान्त वर्ण व्यवस्था का सिद्धान्त है। गीता का स्वधर्म वर्ण धर्म है। गीता अध्याय 4 श्लोक 13 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।। हे अर्जुन! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। (इस प्रकार) उस (सृष्टिरचनादि-कर्म) का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को (तू वास्तव में) अकर्ता ही जान। इस प्रकार गीता चार वर्णों की सामाजिक व्यवस्था की समर्थक है और प्रत्येक व्यक्ति से अपने व्यक्तिगत कर्म को सम्पादित करने का आग्रह करती है।