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Q: बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत: – इति सुभाषितवचनं कस्मिन् ग्रन्थेऽस्ति?
  • A. दशकुमारचरिते
  • B. शिशुपालवधे
  • C. अभिज्ञानशाकुन्तले
  • D. मृच्छकटिके
Correct Answer: Option C - ‘बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत:’ इति सुभाषित वचनं अभिज्ञानशाकुन्तले ग्रन्थेऽस्ति। बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत: यह सुभाषित वचन सूत्रधार द्वारा कथित अभिज्ञानशाकुन्तलम् ग्रन्थ में वर्णित है। इसमें सूत्रधार ने नटी से कहा है कि ‘जब तक विद्वान संतुष्ट न हो जायें, तब तक मैं अपने अभिनय कौशल को सफल नहीं समझता क्योंकि विशेष रूप से सुशिक्षितों को भी अपनी योग्यता के विषय में सन्देह रहता है।’
C. ‘बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत:’ इति सुभाषित वचनं अभिज्ञानशाकुन्तले ग्रन्थेऽस्ति। बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत: यह सुभाषित वचन सूत्रधार द्वारा कथित अभिज्ञानशाकुन्तलम् ग्रन्थ में वर्णित है। इसमें सूत्रधार ने नटी से कहा है कि ‘जब तक विद्वान संतुष्ट न हो जायें, तब तक मैं अपने अभिनय कौशल को सफल नहीं समझता क्योंकि विशेष रूप से सुशिक्षितों को भी अपनी योग्यता के विषय में सन्देह रहता है।’

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‘बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत:’ इति सुभाषित वचनं अभिज्ञानशाकुन्तले ग्रन्थेऽस्ति। बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत: यह सुभाषित वचन सूत्रधार द्वारा कथित अभिज्ञानशाकुन्तलम् ग्रन्थ में वर्णित है। इसमें सूत्रधार ने नटी से कहा है कि ‘जब तक विद्वान संतुष्ट न हो जायें, तब तक मैं अपने अभिनय कौशल को सफल नहीं समझता क्योंकि विशेष रूप से सुशिक्षितों को भी अपनी योग्यता के विषय में सन्देह रहता है।’