Correct Answer:
Option C - ‘भवच्छिदस्त्र्यम्बकपादपांसव:’ इति पदे शिवस्य जय-जयकार:।
भवच्छिदस्त्र्यम्बकपादपांसव: प्रस्तुत पद में शिव की जय-जयकार की गयी है। यह श्लोक बाणभट्ट की रचना कादम्बरी से है। बाणासुर द्वारा मस्तक पर आदरपूर्वक धारण की गयी रावण के मुकुट की मणियों का स्पर्श करने वाली देवों और असुरों के स्वामियों की शिखा के अग्रभाग पर स्थित रहने वाली तथा संसार के बन्धन को काटने वाली शिव के चरणों की धूलि की जय हो।
C. ‘भवच्छिदस्त्र्यम्बकपादपांसव:’ इति पदे शिवस्य जय-जयकार:।
भवच्छिदस्त्र्यम्बकपादपांसव: प्रस्तुत पद में शिव की जय-जयकार की गयी है। यह श्लोक बाणभट्ट की रचना कादम्बरी से है। बाणासुर द्वारा मस्तक पर आदरपूर्वक धारण की गयी रावण के मुकुट की मणियों का स्पर्श करने वाली देवों और असुरों के स्वामियों की शिखा के अग्रभाग पर स्थित रहने वाली तथा संसार के बन्धन को काटने वाली शिव के चरणों की धूलि की जय हो।