Explanations:
नर: स्वे स्वे कर्मण्यभिरत संसिद्धिं प्राप्नोति। अर्थात् मनुष्य अपने-अपने कर्मों में लगा हुआ सफलता को प्राप्त करता है। `स्वे-स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:'। अर्थात् अपने-अपने कर्मों में लगा हुआ व्यक्ति अपनी उचित सफलता को प्राप्त करता है।