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Q: असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवत् कोऽस्ति?
  • A. विषय:
  • B. अध्यारोप:
  • C. मुमुक्षुत्वम्
  • D. तितिक्षा
Correct Answer: Option B - असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवत् ‘अध्यारोप:’ अस्ति। अर्थात् सर्प भाव को न प्राप्त होने वाली रस्सी पर सर्प का आरोप ही अध्यारोप (कहलाता) है यह वस्तु पर अवस्तु के आरोप के समान ही होता है, वस्तु तो त्रिकालातीत सच्चिदानन्द अद्वितीय ब्रह्म है और अवस्तु अज्ञान-मूलक समस्त जड़ पदार्थों का समूह है। अत: विकल्प (b) समीचीन है अन्य शेष विकल्पों का लक्षण- (1) विषय- विषयो जीवब्रह्मैक्यं शुद्ध चैतन्यं प्रमेयम्। (2) मुमुक्षुत्व - मोक्षेच्छा मुमुक्षुत्वं। (3) तितिक्षा - ‘तितिक्षा शीतोष्णादिद्वन्द्वसहिष्णुता’ है।
B. असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवत् ‘अध्यारोप:’ अस्ति। अर्थात् सर्प भाव को न प्राप्त होने वाली रस्सी पर सर्प का आरोप ही अध्यारोप (कहलाता) है यह वस्तु पर अवस्तु के आरोप के समान ही होता है, वस्तु तो त्रिकालातीत सच्चिदानन्द अद्वितीय ब्रह्म है और अवस्तु अज्ञान-मूलक समस्त जड़ पदार्थों का समूह है। अत: विकल्प (b) समीचीन है अन्य शेष विकल्पों का लक्षण- (1) विषय- विषयो जीवब्रह्मैक्यं शुद्ध चैतन्यं प्रमेयम्। (2) मुमुक्षुत्व - मोक्षेच्छा मुमुक्षुत्वं। (3) तितिक्षा - ‘तितिक्षा शीतोष्णादिद्वन्द्वसहिष्णुता’ है।

Explanations:

असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवत् ‘अध्यारोप:’ अस्ति। अर्थात् सर्प भाव को न प्राप्त होने वाली रस्सी पर सर्प का आरोप ही अध्यारोप (कहलाता) है यह वस्तु पर अवस्तु के आरोप के समान ही होता है, वस्तु तो त्रिकालातीत सच्चिदानन्द अद्वितीय ब्रह्म है और अवस्तु अज्ञान-मूलक समस्त जड़ पदार्थों का समूह है। अत: विकल्प (b) समीचीन है अन्य शेष विकल्पों का लक्षण- (1) विषय- विषयो जीवब्रह्मैक्यं शुद्ध चैतन्यं प्रमेयम्। (2) मुमुक्षुत्व - मोक्षेच्छा मुमुक्षुत्वं। (3) तितिक्षा - ‘तितिक्षा शीतोष्णादिद्वन्द्वसहिष्णुता’ है।