Correct Answer:
Option A - सर्वप्रथम ‘छान्दोग्य उपनिषद’ में प्रथम तीनों आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ) का उल्लेख मिलता है। चारों आश्रमों का सर्वप्रथम वर्णन ‘जाबालोपनिषद’ में मिलता है।
ब्रह्मचर्य आश्रम- ब्रह्मचर्य आश्रम सर्वप्रथम आता था। यह प्रारम्भ में 25 वर्ष की आयु तक रहता था। ब्रह्मचर्य में धर्म प्रमुख था। इसमें धर्म की पूरी शिक्षा दी जाती थी। इसके द्वारा ब्रह्मचारी अर्थ और काम पर नियंत्रण स्थापित करते हुए जीवन-यापन करता था।
गृहस्थ आश्रम – यह 25 वर्ष से 50 वर्ष तक रहता था। इसे सभी आश्रमों का स्रोत बताया गया है। इसी आश्रम में रहकर मनुष्य त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ एवं काम का एक साथ उपयोग करते हुए मोक्ष प्राप्ति के योग्य बनता है।
बैखानस या वानप्रस्थ आश्रम – इसमें मनुष्य अपने कुल, गृह तथा ग्राम को छोड़कर वन में जाता था, वहां निवास करते हुए अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण स्थापित करता था। यह 50 वर्ष से 75 वर्ष तक रहता था।
संन्यास आश्रम– यह 75 से 100 वर्ष तक रहता है। इस आश्रम का मूल उद्देश्य परमपद अर्थात् मोक्ष प्राप्त करना था। कुछ शास्त्रकारों ने संन्यास के लिए ‘परिव्राजक’ शब्द काम में लिया है।
उत्तर वैदिक काल में समाज की उन्नति के लिए पुरुषार्थ की अवधारणा सामनें आयी। इन पुरुषार्थों का सही क्रम है– धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। मोक्ष जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है। इसे शास्त्रकारों ने ‘चतुर्वर्ग’ कहा है।
तथा अन्य पुरुषार्थ इसके सहायक हैं।
A. सर्वप्रथम ‘छान्दोग्य उपनिषद’ में प्रथम तीनों आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ) का उल्लेख मिलता है। चारों आश्रमों का सर्वप्रथम वर्णन ‘जाबालोपनिषद’ में मिलता है।
ब्रह्मचर्य आश्रम- ब्रह्मचर्य आश्रम सर्वप्रथम आता था। यह प्रारम्भ में 25 वर्ष की आयु तक रहता था। ब्रह्मचर्य में धर्म प्रमुख था। इसमें धर्म की पूरी शिक्षा दी जाती थी। इसके द्वारा ब्रह्मचारी अर्थ और काम पर नियंत्रण स्थापित करते हुए जीवन-यापन करता था।
गृहस्थ आश्रम – यह 25 वर्ष से 50 वर्ष तक रहता था। इसे सभी आश्रमों का स्रोत बताया गया है। इसी आश्रम में रहकर मनुष्य त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ एवं काम का एक साथ उपयोग करते हुए मोक्ष प्राप्ति के योग्य बनता है।
बैखानस या वानप्रस्थ आश्रम – इसमें मनुष्य अपने कुल, गृह तथा ग्राम को छोड़कर वन में जाता था, वहां निवास करते हुए अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण स्थापित करता था। यह 50 वर्ष से 75 वर्ष तक रहता था।
संन्यास आश्रम– यह 75 से 100 वर्ष तक रहता है। इस आश्रम का मूल उद्देश्य परमपद अर्थात् मोक्ष प्राप्त करना था। कुछ शास्त्रकारों ने संन्यास के लिए ‘परिव्राजक’ शब्द काम में लिया है।
उत्तर वैदिक काल में समाज की उन्नति के लिए पुरुषार्थ की अवधारणा सामनें आयी। इन पुरुषार्थों का सही क्रम है– धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। मोक्ष जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है। इसे शास्त्रकारों ने ‘चतुर्वर्ग’ कहा है।
तथा अन्य पुरुषार्थ इसके सहायक हैं।