Correct Answer:
Option C - अन्तर्वैयक्तिक-प्रज्ञा’ विकासार्थम् अतीव महत्वपूर्णम् परस्परं विचार-विमर्श: अस्ति।
तात्पर्य है – आन्तरिक विशिष्ट ज्ञान का विकास तभी सम्भव है जब एक छात्र दूसरे छात्र से परस्पर विचार-विमर्श करता रहे। यही महत्वपूर्ण विकल्प है।
काव्यशास्त्र के पठन से आन्तरिक रसों या भावों का उद्गम होता है। ना कि अन्तर्वैयक्तिक प्रज्ञा का।
अन्यभाषासु लिखितसाहित्यस्य पठनम् इससे आन्तरिक बोध तथा समाज के विषय से सम्बन्धित ज्ञान प्राप्त होता है तथा भाषा ज्ञान की प्राप्ति होती है।
नूतनविषयान् अधिकृत्य निबन्धलेखनम् का अर्थ है नये विषयों का समावेश कर निबन्ध लेख से भौतिक ज्ञान में वृद्धि होती है।
C. अन्तर्वैयक्तिक-प्रज्ञा’ विकासार्थम् अतीव महत्वपूर्णम् परस्परं विचार-विमर्श: अस्ति।
तात्पर्य है – आन्तरिक विशिष्ट ज्ञान का विकास तभी सम्भव है जब एक छात्र दूसरे छात्र से परस्पर विचार-विमर्श करता रहे। यही महत्वपूर्ण विकल्प है।
काव्यशास्त्र के पठन से आन्तरिक रसों या भावों का उद्गम होता है। ना कि अन्तर्वैयक्तिक प्रज्ञा का।
अन्यभाषासु लिखितसाहित्यस्य पठनम् इससे आन्तरिक बोध तथा समाज के विषय से सम्बन्धित ज्ञान प्राप्त होता है तथा भाषा ज्ञान की प्राप्ति होती है।
नूतनविषयान् अधिकृत्य निबन्धलेखनम् का अर्थ है नये विषयों का समावेश कर निबन्ध लेख से भौतिक ज्ञान में वृद्धि होती है।