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Q: अखिल भुवन चर-अचर जग हरिमुख में लखि मातु। चकित भयी, गदगद वचन, विकसित दृग पुलकातु।। निम्न पंक्तियों में निहित रस है
  • A. अद्भुत रस
  • B. भयानक रस
  • C. वीभत्स रस
  • D. वात्सल्य रस
Correct Answer: Option A - अखिल भुवन चर-अचर जग हरिमुख में लखि मातु। चकित भयी, गदगद वचन, विकसित दृग पुलकातु।। प्रस्तुत पंक्तियों में अद्भुत रस है। यहाँ माता यशोदा द्वारा श्री कृष्ण के बाल रूप मुख में सम्पूर्ण सृष्टि, चर-अचर का दर्शन करने के कारण आश्चर्य उत्पन्न होने का वर्णन है। अद्भुत रस- जब किसी व्यक्ति के मन में अद्भुत या आश्चर्यजनक वस्तुओं को देखकर विस्मय, आश्चर्य आदि के भाव उत्पन्न होते हैं, तो वहाँ अद्भुत रस होता है। इसका स्थायी भाव ‘आश्चर्य’ है। भरतमुनि ने ‘वीर रस’ से अद्भुत की उत्पत्ति बताई है तथा इसका वर्ण पीला एवं देवता ब्रह्मा कहा है। प्रमुख रस एवं उनके स्थायी भाव - रस स्थायी भाव शृंगार रति हास्य हास करुण शोक रौद्र क्रोध वात्सल्य स्नेह वीर उत्साह भयानक भय वीभत्स जुगुप्सा अद्भुत विस्मय शान्त निर्वेद या शम
A. अखिल भुवन चर-अचर जग हरिमुख में लखि मातु। चकित भयी, गदगद वचन, विकसित दृग पुलकातु।। प्रस्तुत पंक्तियों में अद्भुत रस है। यहाँ माता यशोदा द्वारा श्री कृष्ण के बाल रूप मुख में सम्पूर्ण सृष्टि, चर-अचर का दर्शन करने के कारण आश्चर्य उत्पन्न होने का वर्णन है। अद्भुत रस- जब किसी व्यक्ति के मन में अद्भुत या आश्चर्यजनक वस्तुओं को देखकर विस्मय, आश्चर्य आदि के भाव उत्पन्न होते हैं, तो वहाँ अद्भुत रस होता है। इसका स्थायी भाव ‘आश्चर्य’ है। भरतमुनि ने ‘वीर रस’ से अद्भुत की उत्पत्ति बताई है तथा इसका वर्ण पीला एवं देवता ब्रह्मा कहा है। प्रमुख रस एवं उनके स्थायी भाव - रस स्थायी भाव शृंगार रति हास्य हास करुण शोक रौद्र क्रोध वात्सल्य स्नेह वीर उत्साह भयानक भय वीभत्स जुगुप्सा अद्भुत विस्मय शान्त निर्वेद या शम

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अखिल भुवन चर-अचर जग हरिमुख में लखि मातु। चकित भयी, गदगद वचन, विकसित दृग पुलकातु।। प्रस्तुत पंक्तियों में अद्भुत रस है। यहाँ माता यशोदा द्वारा श्री कृष्ण के बाल रूप मुख में सम्पूर्ण सृष्टि, चर-अचर का दर्शन करने के कारण आश्चर्य उत्पन्न होने का वर्णन है। अद्भुत रस- जब किसी व्यक्ति के मन में अद्भुत या आश्चर्यजनक वस्तुओं को देखकर विस्मय, आश्चर्य आदि के भाव उत्पन्न होते हैं, तो वहाँ अद्भुत रस होता है। इसका स्थायी भाव ‘आश्चर्य’ है। भरतमुनि ने ‘वीर रस’ से अद्भुत की उत्पत्ति बताई है तथा इसका वर्ण पीला एवं देवता ब्रह्मा कहा है। प्रमुख रस एवं उनके स्थायी भाव - रस स्थायी भाव शृंगार रति हास्य हास करुण शोक रौद्र क्रोध वात्सल्य स्नेह वीर उत्साह भयानक भय वीभत्स जुगुप्सा अद्भुत विस्मय शान्त निर्वेद या शम