Correct Answer:
Option A - आचार्य भरतमुनि का रससूत्र है - `विभावानुभाव व्यभिचारि संयोगवाद रस निस्पति:'' आचार्य भरतमुनि के बाद भट्टलोल्लट भट्टशंकुक, भट्टनायक तथा अभिनवगुप्त ने रस सिद्धान्त की व्याख्या प्रस्तुत किया। भट्टलोल्लट के आरोपवाद के अनुसार रस निष्पत्ति का अर्थ है उत्पत्ति अथवा आरोप। भट्टशंकुक के अनुमितिवाद के अनुसार विभाव अनुभाव, एवं व्यभिचारी भाव के अनुमान से रस की अनुभिति होती है। भट्टनायक के भक्तिवाद के अनुसार विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारी भाव के अनुभावन (भोग) से रस निष्पत्ति होती है। अभिनव गुप्त अभिव्याqक्तवादी आचार्य थे। उनका मत अभिव्यक्तिवाद के नाम से प्रसिद्ध हैं।
A. आचार्य भरतमुनि का रससूत्र है - `विभावानुभाव व्यभिचारि संयोगवाद रस निस्पति:'' आचार्य भरतमुनि के बाद भट्टलोल्लट भट्टशंकुक, भट्टनायक तथा अभिनवगुप्त ने रस सिद्धान्त की व्याख्या प्रस्तुत किया। भट्टलोल्लट के आरोपवाद के अनुसार रस निष्पत्ति का अर्थ है उत्पत्ति अथवा आरोप। भट्टशंकुक के अनुमितिवाद के अनुसार विभाव अनुभाव, एवं व्यभिचारी भाव के अनुमान से रस की अनुभिति होती है। भट्टनायक के भक्तिवाद के अनुसार विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारी भाव के अनुभावन (भोग) से रस निष्पत्ति होती है। अभिनव गुप्त अभिव्याqक्तवादी आचार्य थे। उनका मत अभिव्यक्तिवाद के नाम से प्रसिद्ध हैं।