Correct Answer:
Option B - प्रस्तुत श्लोक ``आ परितोषाद् विदुषां न साधु मन्ये प्रयोग विज्ञानम्, बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत:।।'' महाकवि कालिदास रचित `अभिज्ञानशाकुन्तलम्' के प्रथम अङ्क का द्वितीय श्लोक है। इसमें सूत्रधार ने नटी से कहा है कि ``जब तक विद्वान सन्तुष्ट न हो जायें, तब तक मैं अपने अभिनय कौशल को सफल नहीं समझता हूँ क्योंकि विशेष रूप से सुशिक्षितों को भी अपनी योग्यता के विषय में सन्देह रहता है।
B. प्रस्तुत श्लोक ``आ परितोषाद् विदुषां न साधु मन्ये प्रयोग विज्ञानम्, बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत:।।'' महाकवि कालिदास रचित `अभिज्ञानशाकुन्तलम्' के प्रथम अङ्क का द्वितीय श्लोक है। इसमें सूत्रधार ने नटी से कहा है कि ``जब तक विद्वान सन्तुष्ट न हो जायें, तब तक मैं अपने अभिनय कौशल को सफल नहीं समझता हूँ क्योंकि विशेष रूप से सुशिक्षितों को भी अपनी योग्यता के विषय में सन्देह रहता है।