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  • A. डा. बच्चन सिंह
  • B. रामस्वरूप चतुर्वेदी
  • C. रामकुमार वर्मा
  • D. विश्वनाथ त्रिपाठी
Correct Answer: Option B - आचार्य शु्क्ल की प्रतिज्ञा में केन्द्रीय प्रयोग ‘जनता की चित्तवृत्ति’ है तथा आचार्य द्विवेदी की प्रस्तावना में ऐसा प्रयोग लोक चिंता का है। यह कथन रामस्वरूप चतुर्वेदी का है। रामस्वरूप चतुर्वेदी द्वारा लिखित हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास (1886) प्रसिद्ध इतिहासग्रंथ है। चतुर्वेदी जी के अनुसार ‘‘किसी भी रचना के लिए कोई भी पूर्व निर्धारित मानदंड नहीं होना चाहिए। हृदय जब मुक्तावस्था में होगा, रचना की मुक्ति होगी, तो आलोचना जो बहुत बाद में विकसित हुई, वृद्धावस्था में नहीं रह सकती।’’ राम स्वरूप चतुर्वेदी की छोटी-बड़ी लगभग सत्ताईस आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हैं जिनमें - हिन्दी नवलेखन, भाषा और संवेदना, अज्ञेय और आधुनिक रचना की समस्या हिन्दी साहित्य की अधुनातन प्रवृत्तियां, कामायनी का पुर्नमुल्यांकन, मध्यकालीन हिन्दी काव्यभाषा, आचार्य रामचन्द्र शु्क्ल : आलोचना का अर्थ और अर्थ की आलोचना इत्यादि।
B. आचार्य शु्क्ल की प्रतिज्ञा में केन्द्रीय प्रयोग ‘जनता की चित्तवृत्ति’ है तथा आचार्य द्विवेदी की प्रस्तावना में ऐसा प्रयोग लोक चिंता का है। यह कथन रामस्वरूप चतुर्वेदी का है। रामस्वरूप चतुर्वेदी द्वारा लिखित हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास (1886) प्रसिद्ध इतिहासग्रंथ है। चतुर्वेदी जी के अनुसार ‘‘किसी भी रचना के लिए कोई भी पूर्व निर्धारित मानदंड नहीं होना चाहिए। हृदय जब मुक्तावस्था में होगा, रचना की मुक्ति होगी, तो आलोचना जो बहुत बाद में विकसित हुई, वृद्धावस्था में नहीं रह सकती।’’ राम स्वरूप चतुर्वेदी की छोटी-बड़ी लगभग सत्ताईस आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हैं जिनमें - हिन्दी नवलेखन, भाषा और संवेदना, अज्ञेय और आधुनिक रचना की समस्या हिन्दी साहित्य की अधुनातन प्रवृत्तियां, कामायनी का पुर्नमुल्यांकन, मध्यकालीन हिन्दी काव्यभाषा, आचार्य रामचन्द्र शु्क्ल : आलोचना का अर्थ और अर्थ की आलोचना इत्यादि।

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आचार्य शु्क्ल की प्रतिज्ञा में केन्द्रीय प्रयोग ‘जनता की चित्तवृत्ति’ है तथा आचार्य द्विवेदी की प्रस्तावना में ऐसा प्रयोग लोक चिंता का है। यह कथन रामस्वरूप चतुर्वेदी का है। रामस्वरूप चतुर्वेदी द्वारा लिखित हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास (1886) प्रसिद्ध इतिहासग्रंथ है। चतुर्वेदी जी के अनुसार ‘‘किसी भी रचना के लिए कोई भी पूर्व निर्धारित मानदंड नहीं होना चाहिए। हृदय जब मुक्तावस्था में होगा, रचना की मुक्ति होगी, तो आलोचना जो बहुत बाद में विकसित हुई, वृद्धावस्था में नहीं रह सकती।’’ राम स्वरूप चतुर्वेदी की छोटी-बड़ी लगभग सत्ताईस आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हैं जिनमें - हिन्दी नवलेखन, भाषा और संवेदना, अज्ञेय और आधुनिक रचना की समस्या हिन्दी साहित्य की अधुनातन प्रवृत्तियां, कामायनी का पुर्नमुल्यांकन, मध्यकालीन हिन्दी काव्यभाषा, आचार्य रामचन्द्र शु्क्ल : आलोचना का अर्थ और अर्थ की आलोचना इत्यादि।