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  • A. 2 1 3 4
  • B. 2 3 1 4
  • C. 2 1 4 3
  • D. उपर्युक्त में से एक से अधिक
  • E. उपर्युक्त में से कोई नहीं
Correct Answer: Option C - काव्य-रचनाओं का रचनाकारों के साथ सही सुमेलन है। काव्य रचना रचनाकार कामायनी - जयशंकर प्रसाद सरोज-स्मृति - सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला वीणा - पंत दीपशिखा - महादेवी वर्मा ⇒ छायावाद के कवि-चतुष्टय जयशंकर प्रसाद (शैवदर्शन-आइन्दवाद), सुमित्रानंदन पंत (अरविन्द दर्शन), निराला (अद्वैत दर्शन), महादेवी वर्मा (बौद्ध दर्शन-दु:खवाद) है। ⇒ जयशंकर प्रसाद आरम्भ में ‘कलावर’ उपनाम से ब्रजभाषा में कवितायें लिखते थे। इनके बाल्यकाल का नाम झारखण्डी था। ⇒ ‘कानन कुसुम’ जयशंकर प्रसाद का खड़ी बोली में प्रथम काव्य संग्रह है। ⇒ ‘झरना’ को हिन्दी में छायावाद का प्रथम काव्य संग्रह माना जाता है। इसे ‘छायावाद का प्रथम प्रयोगशाला’ भी कहा जाता है। ⇒ कामायनी जयशंकर प्रसाद की महाकाव्यात्मक रचना है। जो 15 सर्गों में तथा ताटंक छंद में लिखा गया है। इसका अंगीरस शांत रस है। इसके मुख्य पात्र मनु, श्रद्धा, इड़ा और कुमार है। कामायनी के सर्ग-चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईष्र्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य, आनन्द। ⇒ शांतिप्रिय द्विवेदी ने कामायनी को छायावाद का उपनिषद कहा है। ⇒ जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ-उर्वशी (1909), वनमिलन (1909), प्रेमराज्य (1909), अयोद्धा का उद्धार (1910), शोकोच्छवास (1910), वभ्रुवाहन (1911), कानन कुसुम (1913), प्रेमपथिक (1914), महाराणा का महत्व (1914), चित्रावार (1918), झरना (1918), आसू (19125), लहर (1933), कामायनी (1935)। ⇒ निराला को छायावाद का ‘शलाका पुरुष’ कहा जाता है। इन्हें हिंदी में मुक्त छंद का प्रवर्तक माना जाता है। ⇒ निराला द्वारा लिखित सरोजस्मृति (1935) उनकी पुत्री ‘सरोज’ की असमय मृत्यु पर लिखा गया शोकगीत है। इसे हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ तथा प्रथम शोक गीत माना जाता है। ⇒ गीतिका काव्य संग्रह की भूमिका जयशंकर प्रसाद ने लिखा है तथा तुलसीदास 101 छंछों में लिखा एक खण्डकाव्य है। ⇒ निराला की रचनाएँ-अनामिका (1923), परिमल (1930), गीतिका (1936), तुलसीदास (1938), कुकुरमुत्ता (1942), अणिमा (1943), बेला (1946), नये पत्ते (1946), अर्चना (1950), आराधना (1953), गीतगुज (1954), सांध्यकाकली (1969)। ⇒ निराला की प्रथम कविता ‘जूही की कली’ (1916), तथा अन्तिम कविता ‘पत्रोत्कठित जीवन का विष बुझा हुआ है। ⇒ पंत को प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है। इनकी प्रथम छाया रचना उच्छवास और अंतिम छायावादी रचना ‘गुंजन’ है। ⇒ पंत कृत ‘पल्लव’ की भूमिका को ‘छायावाद का घोषणा पत्र’ कहा जाता है। पंत महत्वूपर्ण कविताओं का संकलन ‘चिदम्बरा’ शीर्षक से प्रकाशित है इस पर इन्हें ‘भारतीय ज्ञान पीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ है। पंत की रचनाएँ- ⇒ छायावादी रचनाएँ-उच्छवास (1920), ग्रंथि (1920), वीणा (1927), पल्लव (1928), गंजन (1932)। ⇒ प्रगतिवादी रचनाएँ-युगांत (1936), युगवाणी (1939), ग्राम्या (1940)। ⇒ अन्तश्चेतनावादी रचनाएँ-स्वर्णकिरण (1947), स्वर्ण धूलि (1947), युगपथ (1947)। ⇒ नवमानवतावादी रचनाएँ-उत्तरा (1949), कला और बूढ़ा चाँद (1959), अतिमा (1955), लोकायतन (1964), चिदम्बरा। ⇒ महादेवी वर्मा को ‘हिन्दी की विशाल मन्दिर की वीणा पाणि’ कहा जाता है। ⇒ महादेवी वर्मा कृत ‘यामा’ में उनके नीहार, रश्मि, नीरजा और सांत्यगीत के महत्वपूर्ण गीतों का संकलन किया गया है। यामा पर महादेवी वर्मा की ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ। ⇒ अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने महादेवी के प्रथम काव्य संकलन ‘नीहार’ की भूमिका सन् 1930 ई. में लिखी थी। ⇒ महादेवी वर्मा की रचनाएँ-नीहार (1930), रश्मि (1932), नीरजा (1935), सांध्यगीत (1936), यामा (1940), दीपशिखा (1942), सप्तपर्णा (1960)।
C. काव्य-रचनाओं का रचनाकारों के साथ सही सुमेलन है। काव्य रचना रचनाकार कामायनी - जयशंकर प्रसाद सरोज-स्मृति - सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला वीणा - पंत दीपशिखा - महादेवी वर्मा ⇒ छायावाद के कवि-चतुष्टय जयशंकर प्रसाद (शैवदर्शन-आइन्दवाद), सुमित्रानंदन पंत (अरविन्द दर्शन), निराला (अद्वैत दर्शन), महादेवी वर्मा (बौद्ध दर्शन-दु:खवाद) है। ⇒ जयशंकर प्रसाद आरम्भ में ‘कलावर’ उपनाम से ब्रजभाषा में कवितायें लिखते थे। इनके बाल्यकाल का नाम झारखण्डी था। ⇒ ‘कानन कुसुम’ जयशंकर प्रसाद का खड़ी बोली में प्रथम काव्य संग्रह है। ⇒ ‘झरना’ को हिन्दी में छायावाद का प्रथम काव्य संग्रह माना जाता है। इसे ‘छायावाद का प्रथम प्रयोगशाला’ भी कहा जाता है। ⇒ कामायनी जयशंकर प्रसाद की महाकाव्यात्मक रचना है। जो 15 सर्गों में तथा ताटंक छंद में लिखा गया है। इसका अंगीरस शांत रस है। इसके मुख्य पात्र मनु, श्रद्धा, इड़ा और कुमार है। कामायनी के सर्ग-चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईष्र्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य, आनन्द। ⇒ शांतिप्रिय द्विवेदी ने कामायनी को छायावाद का उपनिषद कहा है। ⇒ जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ-उर्वशी (1909), वनमिलन (1909), प्रेमराज्य (1909), अयोद्धा का उद्धार (1910), शोकोच्छवास (1910), वभ्रुवाहन (1911), कानन कुसुम (1913), प्रेमपथिक (1914), महाराणा का महत्व (1914), चित्रावार (1918), झरना (1918), आसू (19125), लहर (1933), कामायनी (1935)। ⇒ निराला को छायावाद का ‘शलाका पुरुष’ कहा जाता है। इन्हें हिंदी में मुक्त छंद का प्रवर्तक माना जाता है। ⇒ निराला द्वारा लिखित सरोजस्मृति (1935) उनकी पुत्री ‘सरोज’ की असमय मृत्यु पर लिखा गया शोकगीत है। इसे हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ तथा प्रथम शोक गीत माना जाता है। ⇒ गीतिका काव्य संग्रह की भूमिका जयशंकर प्रसाद ने लिखा है तथा तुलसीदास 101 छंछों में लिखा एक खण्डकाव्य है। ⇒ निराला की रचनाएँ-अनामिका (1923), परिमल (1930), गीतिका (1936), तुलसीदास (1938), कुकुरमुत्ता (1942), अणिमा (1943), बेला (1946), नये पत्ते (1946), अर्चना (1950), आराधना (1953), गीतगुज (1954), सांध्यकाकली (1969)। ⇒ निराला की प्रथम कविता ‘जूही की कली’ (1916), तथा अन्तिम कविता ‘पत्रोत्कठित जीवन का विष बुझा हुआ है। ⇒ पंत को प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है। इनकी प्रथम छाया रचना उच्छवास और अंतिम छायावादी रचना ‘गुंजन’ है। ⇒ पंत कृत ‘पल्लव’ की भूमिका को ‘छायावाद का घोषणा पत्र’ कहा जाता है। पंत महत्वूपर्ण कविताओं का संकलन ‘चिदम्बरा’ शीर्षक से प्रकाशित है इस पर इन्हें ‘भारतीय ज्ञान पीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ है। पंत की रचनाएँ- ⇒ छायावादी रचनाएँ-उच्छवास (1920), ग्रंथि (1920), वीणा (1927), पल्लव (1928), गंजन (1932)। ⇒ प्रगतिवादी रचनाएँ-युगांत (1936), युगवाणी (1939), ग्राम्या (1940)। ⇒ अन्तश्चेतनावादी रचनाएँ-स्वर्णकिरण (1947), स्वर्ण धूलि (1947), युगपथ (1947)। ⇒ नवमानवतावादी रचनाएँ-उत्तरा (1949), कला और बूढ़ा चाँद (1959), अतिमा (1955), लोकायतन (1964), चिदम्बरा। ⇒ महादेवी वर्मा को ‘हिन्दी की विशाल मन्दिर की वीणा पाणि’ कहा जाता है। ⇒ महादेवी वर्मा कृत ‘यामा’ में उनके नीहार, रश्मि, नीरजा और सांत्यगीत के महत्वपूर्ण गीतों का संकलन किया गया है। यामा पर महादेवी वर्मा की ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ। ⇒ अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने महादेवी के प्रथम काव्य संकलन ‘नीहार’ की भूमिका सन् 1930 ई. में लिखी थी। ⇒ महादेवी वर्मा की रचनाएँ-नीहार (1930), रश्मि (1932), नीरजा (1935), सांध्यगीत (1936), यामा (1940), दीपशिखा (1942), सप्तपर्णा (1960)।

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काव्य-रचनाओं का रचनाकारों के साथ सही सुमेलन है। काव्य रचना रचनाकार कामायनी - जयशंकर प्रसाद सरोज-स्मृति - सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला वीणा - पंत दीपशिखा - महादेवी वर्मा ⇒ छायावाद के कवि-चतुष्टय जयशंकर प्रसाद (शैवदर्शन-आइन्दवाद), सुमित्रानंदन पंत (अरविन्द दर्शन), निराला (अद्वैत दर्शन), महादेवी वर्मा (बौद्ध दर्शन-दु:खवाद) है। ⇒ जयशंकर प्रसाद आरम्भ में ‘कलावर’ उपनाम से ब्रजभाषा में कवितायें लिखते थे। इनके बाल्यकाल का नाम झारखण्डी था। ⇒ ‘कानन कुसुम’ जयशंकर प्रसाद का खड़ी बोली में प्रथम काव्य संग्रह है। ⇒ ‘झरना’ को हिन्दी में छायावाद का प्रथम काव्य संग्रह माना जाता है। इसे ‘छायावाद का प्रथम प्रयोगशाला’ भी कहा जाता है। ⇒ कामायनी जयशंकर प्रसाद की महाकाव्यात्मक रचना है। जो 15 सर्गों में तथा ताटंक छंद में लिखा गया है। इसका अंगीरस शांत रस है। इसके मुख्य पात्र मनु, श्रद्धा, इड़ा और कुमार है। कामायनी के सर्ग-चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईष्र्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य, आनन्द। ⇒ शांतिप्रिय द्विवेदी ने कामायनी को छायावाद का उपनिषद कहा है। ⇒ जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ-उर्वशी (1909), वनमिलन (1909), प्रेमराज्य (1909), अयोद्धा का उद्धार (1910), शोकोच्छवास (1910), वभ्रुवाहन (1911), कानन कुसुम (1913), प्रेमपथिक (1914), महाराणा का महत्व (1914), चित्रावार (1918), झरना (1918), आसू (19125), लहर (1933), कामायनी (1935)। ⇒ निराला को छायावाद का ‘शलाका पुरुष’ कहा जाता है। इन्हें हिंदी में मुक्त छंद का प्रवर्तक माना जाता है। ⇒ निराला द्वारा लिखित सरोजस्मृति (1935) उनकी पुत्री ‘सरोज’ की असमय मृत्यु पर लिखा गया शोकगीत है। इसे हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ तथा प्रथम शोक गीत माना जाता है। ⇒ गीतिका काव्य संग्रह की भूमिका जयशंकर प्रसाद ने लिखा है तथा तुलसीदास 101 छंछों में लिखा एक खण्डकाव्य है। ⇒ निराला की रचनाएँ-अनामिका (1923), परिमल (1930), गीतिका (1936), तुलसीदास (1938), कुकुरमुत्ता (1942), अणिमा (1943), बेला (1946), नये पत्ते (1946), अर्चना (1950), आराधना (1953), गीतगुज (1954), सांध्यकाकली (1969)। ⇒ निराला की प्रथम कविता ‘जूही की कली’ (1916), तथा अन्तिम कविता ‘पत्रोत्कठित जीवन का विष बुझा हुआ है। ⇒ पंत को प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है। इनकी प्रथम छाया रचना उच्छवास और अंतिम छायावादी रचना ‘गुंजन’ है। ⇒ पंत कृत ‘पल्लव’ की भूमिका को ‘छायावाद का घोषणा पत्र’ कहा जाता है। पंत महत्वूपर्ण कविताओं का संकलन ‘चिदम्बरा’ शीर्षक से प्रकाशित है इस पर इन्हें ‘भारतीय ज्ञान पीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ है। पंत की रचनाएँ- ⇒ छायावादी रचनाएँ-उच्छवास (1920), ग्रंथि (1920), वीणा (1927), पल्लव (1928), गंजन (1932)। ⇒ प्रगतिवादी रचनाएँ-युगांत (1936), युगवाणी (1939), ग्राम्या (1940)। ⇒ अन्तश्चेतनावादी रचनाएँ-स्वर्णकिरण (1947), स्वर्ण धूलि (1947), युगपथ (1947)। ⇒ नवमानवतावादी रचनाएँ-उत्तरा (1949), कला और बूढ़ा चाँद (1959), अतिमा (1955), लोकायतन (1964), चिदम्बरा। ⇒ महादेवी वर्मा को ‘हिन्दी की विशाल मन्दिर की वीणा पाणि’ कहा जाता है। ⇒ महादेवी वर्मा कृत ‘यामा’ में उनके नीहार, रश्मि, नीरजा और सांत्यगीत के महत्वपूर्ण गीतों का संकलन किया गया है। यामा पर महादेवी वर्मा की ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ। ⇒ अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने महादेवी के प्रथम काव्य संकलन ‘नीहार’ की भूमिका सन् 1930 ई. में लिखी थी। ⇒ महादेवी वर्मा की रचनाएँ-नीहार (1930), रश्मि (1932), नीरजा (1935), सांध्यगीत (1936), यामा (1940), दीपशिखा (1942), सप्तपर्णा (1960)।