Correct Answer:
Option B - उत्तर-भारत में भक्ति आंदोलन के प्रथम प्रवर्तक रामानन्द का जन्म 1299 ई. में प्रयाग में हुआ था। वे श्री सम्प्रदाय के संत राघवानन्द के शिष्य थे। वह सगुण भक्ति धारा के सन्त थे। भक्ति को मोक्ष का साधन मानते हुए उन्होंने राम-सीता की उपासना का आदर्श समाज के सम्मुख रखा। उन्होंने जाति-प्रथा का विरोध किया तथा विभिन्न जाति के लोगों को अपना शिष्य बनाया। उनका कहना था कि ‘‘कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति से उसका धर्म सम्प्रदाय या जाति न पूछे।’’ आगे कहते हैं कि, ‘‘ईश्वर मनुष्य के गुणों को देखता है, उसकी जाति को नहीं, दूसरे संसार में कोई जाति नहीं है।’’ वह पहले सन्त थे जिन्होंने अपना संदेश हिन्दी में दिया था। रामानंद के प्रमुख शिष्य- संत कबीर (जुलाहा), संत रविदास या रैदास (मोची), धन्ना (जाट), सेना (नाई), सदना (कसाई), पीपा (राजपूत)।
नोट- नामदेव महाराष्ट्र के प्रमुख भक्ति मार्गी सन्तों में एक थे। नामदेव एक दर्जी थे। इन्होंने महाराष्ट्र, पंजाब आदि प्रदेशों में निर्गुण का प्रचार किया।
B. उत्तर-भारत में भक्ति आंदोलन के प्रथम प्रवर्तक रामानन्द का जन्म 1299 ई. में प्रयाग में हुआ था। वे श्री सम्प्रदाय के संत राघवानन्द के शिष्य थे। वह सगुण भक्ति धारा के सन्त थे। भक्ति को मोक्ष का साधन मानते हुए उन्होंने राम-सीता की उपासना का आदर्श समाज के सम्मुख रखा। उन्होंने जाति-प्रथा का विरोध किया तथा विभिन्न जाति के लोगों को अपना शिष्य बनाया। उनका कहना था कि ‘‘कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति से उसका धर्म सम्प्रदाय या जाति न पूछे।’’ आगे कहते हैं कि, ‘‘ईश्वर मनुष्य के गुणों को देखता है, उसकी जाति को नहीं, दूसरे संसार में कोई जाति नहीं है।’’ वह पहले सन्त थे जिन्होंने अपना संदेश हिन्दी में दिया था। रामानंद के प्रमुख शिष्य- संत कबीर (जुलाहा), संत रविदास या रैदास (मोची), धन्ना (जाट), सेना (नाई), सदना (कसाई), पीपा (राजपूत)।
नोट- नामदेव महाराष्ट्र के प्रमुख भक्ति मार्गी सन्तों में एक थे। नामदेव एक दर्जी थे। इन्होंने महाराष्ट्र, पंजाब आदि प्रदेशों में निर्गुण का प्रचार किया।