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  • A. सही भाषण, सही ज्ञान और सही आचरण।
  • B. सही विश्वास, सही ज्ञान और सही व्यवहार।
  • C. सही विश्वास, सही पथ और सही आचरण।
  • D. सही विश्वास, सही ज्ञान और सही आचरण।
Correct Answer: Option D - जैन धर्म के संस्थापक एवं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे। महावीर स्वामी जैन धर्म के २४वें और अंतिम तीर्थंकर हुए। महावीर स्वामी का जन्म कुण्डग्राम (वैशाली) में हुआ था। महावीर स्वामी ने अपने उपदेश प्राकृत (अर्धमागधी) भाषा में दिए। जैन धर्म में निर्वाण की प्राप्ति के लिए त्रिरत्न का अनुशीलन आवश्यक है। जैन धर्म के त्रिरत्न हैं– (i) सम्यक् दर्शन (सही विश्वास) (ii) सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान) (iii) सम्यक् आचरण (सुख दु:ख में समभाव आचरण) जैन धर्म में ईश्वर की मान्यता नहीं है इसमें आत्मा की मान्यता है। महावीर स्वामी पुनर्जन्म एवं कर्मवाद में विश्वास करते थे।
D. जैन धर्म के संस्थापक एवं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे। महावीर स्वामी जैन धर्म के २४वें और अंतिम तीर्थंकर हुए। महावीर स्वामी का जन्म कुण्डग्राम (वैशाली) में हुआ था। महावीर स्वामी ने अपने उपदेश प्राकृत (अर्धमागधी) भाषा में दिए। जैन धर्म में निर्वाण की प्राप्ति के लिए त्रिरत्न का अनुशीलन आवश्यक है। जैन धर्म के त्रिरत्न हैं– (i) सम्यक् दर्शन (सही विश्वास) (ii) सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान) (iii) सम्यक् आचरण (सुख दु:ख में समभाव आचरण) जैन धर्म में ईश्वर की मान्यता नहीं है इसमें आत्मा की मान्यता है। महावीर स्वामी पुनर्जन्म एवं कर्मवाद में विश्वास करते थे।

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जैन धर्म के संस्थापक एवं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे। महावीर स्वामी जैन धर्म के २४वें और अंतिम तीर्थंकर हुए। महावीर स्वामी का जन्म कुण्डग्राम (वैशाली) में हुआ था। महावीर स्वामी ने अपने उपदेश प्राकृत (अर्धमागधी) भाषा में दिए। जैन धर्म में निर्वाण की प्राप्ति के लिए त्रिरत्न का अनुशीलन आवश्यक है। जैन धर्म के त्रिरत्न हैं– (i) सम्यक् दर्शन (सही विश्वास) (ii) सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान) (iii) सम्यक् आचरण (सुख दु:ख में समभाव आचरण) जैन धर्म में ईश्वर की मान्यता नहीं है इसमें आत्मा की मान्यता है। महावीर स्वामी पुनर्जन्म एवं कर्मवाद में विश्वास करते थे।