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Q: .
  • A. पी.डी.गुणे
  • B. वांद्रेये
  • C. सुकुमार सेन
  • D. बाबूराम सक्सेना
Correct Answer: Option C - ‘अर्थवान, कण्ठोद्गीर्ण ध्वनि-समष्टि ही भाषा है, भाषा की उपर्युक्त परिभाषा ‘सुकुमार सेन’ ने दी है। भाषा के संबंध में अन्य विद्वानों के मत - • ‘‘जिन ध्वनि चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है, उनको समष्टि रूप से भाषा कहते हैं-’’ बाबू राम सक्सेना • ‘‘ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा हृदयगत भावों तथा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है।’’- डॉ. पी.डी गुणे • ‘‘भाषा एक प्रकार का चिह्न है, चिह्न से तात्पर्य उन प्रतीकों से है जिनके द्वारा मनुष्य अपना विचार दूसरों पर प्रकट करता है। ये प्रतीक भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे-नेत्रग्राह्य, श्रोतग्राह्य एवं स्पर्श ग्राह्य। वस्तुत: भाषा की दृष्टि से श्रोतग्राह्य प्रतीक ही सर्वश्रेष्ठ है।’’- वांद्रेये • ‘‘भाषा उस स्पष्ट, सीमित तथा सुसंगठित ध्वनि को कहते हैं। जो अभिव्यंजना के लिए नियुक्त की जाती है।’’ - क्रोचे
C. ‘अर्थवान, कण्ठोद्गीर्ण ध्वनि-समष्टि ही भाषा है, भाषा की उपर्युक्त परिभाषा ‘सुकुमार सेन’ ने दी है। भाषा के संबंध में अन्य विद्वानों के मत - • ‘‘जिन ध्वनि चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है, उनको समष्टि रूप से भाषा कहते हैं-’’ बाबू राम सक्सेना • ‘‘ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा हृदयगत भावों तथा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है।’’- डॉ. पी.डी गुणे • ‘‘भाषा एक प्रकार का चिह्न है, चिह्न से तात्पर्य उन प्रतीकों से है जिनके द्वारा मनुष्य अपना विचार दूसरों पर प्रकट करता है। ये प्रतीक भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे-नेत्रग्राह्य, श्रोतग्राह्य एवं स्पर्श ग्राह्य। वस्तुत: भाषा की दृष्टि से श्रोतग्राह्य प्रतीक ही सर्वश्रेष्ठ है।’’- वांद्रेये • ‘‘भाषा उस स्पष्ट, सीमित तथा सुसंगठित ध्वनि को कहते हैं। जो अभिव्यंजना के लिए नियुक्त की जाती है।’’ - क्रोचे

Explanations:

‘अर्थवान, कण्ठोद्गीर्ण ध्वनि-समष्टि ही भाषा है, भाषा की उपर्युक्त परिभाषा ‘सुकुमार सेन’ ने दी है। भाषा के संबंध में अन्य विद्वानों के मत - • ‘‘जिन ध्वनि चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है, उनको समष्टि रूप से भाषा कहते हैं-’’ बाबू राम सक्सेना • ‘‘ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा हृदयगत भावों तथा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है।’’- डॉ. पी.डी गुणे • ‘‘भाषा एक प्रकार का चिह्न है, चिह्न से तात्पर्य उन प्रतीकों से है जिनके द्वारा मनुष्य अपना विचार दूसरों पर प्रकट करता है। ये प्रतीक भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे-नेत्रग्राह्य, श्रोतग्राह्य एवं स्पर्श ग्राह्य। वस्तुत: भाषा की दृष्टि से श्रोतग्राह्य प्रतीक ही सर्वश्रेष्ठ है।’’- वांद्रेये • ‘‘भाषा उस स्पष्ट, सीमित तथा सुसंगठित ध्वनि को कहते हैं। जो अभिव्यंजना के लिए नियुक्त की जाती है।’’ - क्रोचे