Correct Answer:
Option C - हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ निबंध के अनुसार मानव शरीर का अध्ययन करने वाले प्राणी वैज्ञानिकों का निश्चित मत है कि मानव-चित्त की भाँति मानव शरीर में भी बहुत सी अभ्यासजन्य सहज वृत्तियाँ रह गई है।
⇒ ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ हजारी प्रसाद द्विवेदी का ललित निबन्ध है। अपनी छोटी लड़की के यह पूछने पर कि ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का ललित निबन्धकार की प्रवृत्ति जाग उठती है और वे इसका उत्तर खोजने के लिए मनुष्य के आदिमकाल से अब तक के जीवन पर दृष्टिपात करते है और इस ललित निबन्ध में इस निष्कर्ष पर पहुचते है कि नाखून पशुता के प्रतीक हैं और उनका काटना मनुष्यता की निशानी है। ये अस्त्र-शस्त्रों, अणु, परमाणु बमों का बनना भी पशुता की प्रवृत्ति है।
⇒ हजारी प्रसाद द्विवेदी छायावादोत्तर निबन्धकारों में सर्वश्रेष्ठ है। इनके निबन्धों की आधारभूमि भारतीय संस्कृति है। किसी भी पौधे, पशु या पक्षी को माध्यम बनाकर एक मनोरम भावभूमि की सृष्टि करते हुए भारत के अतीत और वर्तमान सांस्कृतिक जीवन की सरसता को छू लेना द्विवेजी के लिए एक सहज व्यापार है। इनके निबन्ध संग्रह इस प्रकार हैं- अशोक के फूल (1948), कल्पलता (1951), मध्यकालीन धर्मसाधना (1952), विचार और वितर्क (1957), विचार प्रवाह (1959 ), कुटज (1964), साहित्यसहचर (1965), आलोक पर्व (1972)।
C. हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ निबंध के अनुसार मानव शरीर का अध्ययन करने वाले प्राणी वैज्ञानिकों का निश्चित मत है कि मानव-चित्त की भाँति मानव शरीर में भी बहुत सी अभ्यासजन्य सहज वृत्तियाँ रह गई है।
⇒ ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ हजारी प्रसाद द्विवेदी का ललित निबन्ध है। अपनी छोटी लड़की के यह पूछने पर कि ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का ललित निबन्धकार की प्रवृत्ति जाग उठती है और वे इसका उत्तर खोजने के लिए मनुष्य के आदिमकाल से अब तक के जीवन पर दृष्टिपात करते है और इस ललित निबन्ध में इस निष्कर्ष पर पहुचते है कि नाखून पशुता के प्रतीक हैं और उनका काटना मनुष्यता की निशानी है। ये अस्त्र-शस्त्रों, अणु, परमाणु बमों का बनना भी पशुता की प्रवृत्ति है।
⇒ हजारी प्रसाद द्विवेदी छायावादोत्तर निबन्धकारों में सर्वश्रेष्ठ है। इनके निबन्धों की आधारभूमि भारतीय संस्कृति है। किसी भी पौधे, पशु या पक्षी को माध्यम बनाकर एक मनोरम भावभूमि की सृष्टि करते हुए भारत के अतीत और वर्तमान सांस्कृतिक जीवन की सरसता को छू लेना द्विवेजी के लिए एक सहज व्यापार है। इनके निबन्ध संग्रह इस प्रकार हैं- अशोक के फूल (1948), कल्पलता (1951), मध्यकालीन धर्मसाधना (1952), विचार और वितर्क (1957), विचार प्रवाह (1959 ), कुटज (1964), साहित्यसहचर (1965), आलोक पर्व (1972)।