‘प्रारब्ध’ का विलोम शब्द है
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In Rigveda, Tasar is used for which of the following? ऋग्वेद में, तसर निम्नलिखित में किसके लिए प्रयोग हुआ है?
मिट्टी का नमूना लेते समय क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए।
एक रंगभेद विरोधी कार्यकर्ता............को दक्षिण अफ्रीका द्वारा वर्ष 1952 में 27 वर्षो के लिये कारागार में रखा गया था।
In a certain code language, 'GYM' is written as 'FXL'. What is the code for 'TRAINER' in that code language?
निर्देश- प्रश्न संख्या (245 से 252) निम्नलिखितं गद्यांशं पठित्वा नवप्रश्नानां उचितंं विकल्पं चित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि दातव्यानि। पुरा वृत्रासुर : देवान् भृशमपीडयत्। इन्द्रादय: ते देवा: प्रजापतिमुपागच्छन्। तान् समागतान् दृष्ट्वा प्रजापति: आगमनस्य कारणमपृच्छत् । ते प्रत्यवदन् - ‘‘प्रभो! वृत्रासुर: अस्मान् पीडयति। तस्य शक्ते : पुरत: वयं स्थातुं न शक्नुम:। अत: भीता: वयमत्रागता:। प्रजापते अभणत् - ‘‘हरि: एव अस्मान् रक्षितुं समर्थ:। तमेव शरणं गच्छाम:।’’ प्रजापति: देवै: साकं वैकुण्ठं गत्वा हरये सर्वमपि वृत्तान्तं न्यवेदयत् । तत् श्रुत्वा हरि: अकथयत् - ‘‘भो: प्रजापति! देवा: महर्षे: दधीचे: अन्तिकं गत्वा तस्मात् अस्थियाचनं कुर्वन्तु। स: नूनमस्थीनि दास्यति। तै: अस्थिभि: वङ्काायुधं घटयत। तेन वृत्रं हन्तु युद्धे असुरान् जेतुं च पारयिष्यथ।’’ देवा: दधीचे: आश्रमं प्राविशन्। तत्र ते अनेकै : ऋषिभि: परिवृतमग्निमिव प्रभया देदीप्यमानं दधीचिमपश्यन् । ते ऋषीन् दधीचिं च दृष्ट्वा अनमन्। दधीचि: इन्द्रं- ‘‘किमर्थं यूयमत्रागता:’’ इत्यपृच्छत् । इन्द्र: सादरमकथयत् - ‘‘महर्षे, वयं वृत्रेण पीड़िता : त्वां शरणमुपागता:। कृपया त्वमस्मभ्यं स्वानि अस्थीनि प्रयच्छ। घटयाम तै: अस्थिभि: आयुधम्, येन वयं वृत्रं हन्तुं पारयाम:।’’ दधीचि: इन्द्रस्य वचनं श्रुत्वा नितरामतुष्यत् । स: अकथयत् - ‘‘भो: इन्द्र! अद्य मम जीवितं सफलं जातं यत् मे शरीरं युष्माकमुपकाराय भवति। परोपकारार्थमिदं शरीरम् । अहं युष्मभ्यमिदं शरीरं सहर्षं प्रयच्छामि, स्वीकुरुत।’’ स: नेत्रे निमील्य समाधिस्थ: अभवत् । देवा: तस्य अस्थीनि आदाय तै: वङ्काायुधमरचयन् । तेन च इन्द्र: युद्धे वृत्रासुरममारयत् । एवं देवा: दधीचे: औदार्येण वृत्रभयात् मुक्ता : अभवन्।देवा: वृत्रासुरं हन्तुं कम् उपायम् अकरोत् ?
The air is a ………….?
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित प्रश्न का सटीक उत्तर दीजिए: साहित्यिक समन्वय से हमारा तात्पर्य साहित्य में प्रदर्शित सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, उत्थान-पतन आदि विरोधी तथा विपरीत भावों के समीकरण तथा एक आलौकिक आनंद में उनके विलीन हो जाने में है। साहित्य के किसी अंश को लेकर देखिए, सर्वत्र यही समन्वय दिखाई देगा। भारतीय नाटकों में ही सुख और दु:ख के प्रबल घात-प्रतिघात दिखाए गये हैं, पर सबका अवसान आनंद में ही किया गया है। इसका प्रधान कारण यह है कि भारतीयों का ध्येय सदा से जीवन का आदर्श स्वरूप उपस्थित करके उसका उत्कर्ष बढ़ाने और उसे उन्नत बनाने का रहा है। वर्तमान स्थिति से उसका इतना संबंध नहीं है जितना भविष्य की संभाव्य उन्नति से है। हमारे यहाँ यूरोपीय ढंग के दुखांत नाटक इसीलिए दिखाई नहीं पड़ते हैं। यदि आजकल ऐसे नाटक दिखाई पड़ने लगे हैं तो वे भारतीय आदर्श से दूर और यूरोपीय आदर्श के अनुकरण मात्र हैं। भारतीय नाटकों में दिखाया गया है:
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